तिब्बती धर्मगुरु दलाईलामा ने कहा कि भारत भाईचारा और शांति की सबसे बड़ी मिसाल है। यहां हर वर्ग और जाति के लोग मिलकर रहते हैं। विश्व के दूसरे देशों को भारत से सीख लेने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि संस्कृत भाषा सर्वोच्च है। यह भाषा भी लोगों को जोड़ने का काम करती है।
सोमवार को महावन स्थितरमणरेती आश्रम में पहुंचे तिब्बती धर्मगुरु ने कहा कि आज हर कोई समस्याओं से पीड़ित है। लेकिन यह समस्याएं भी खुद मनुष्य ने ही बनाई हैं। उन्होंने कहा कि प्रसन्नता एक ऐसा हथियार है जिसके बूते हम हर समस्या को फतह कर सकते हैं।
उन्होंने कई उदाहरण देते हुए कहा कि वह जब दूसरों को प्रसन्न देखते हैं तो खुद भी प्रसन्न हो जाते हैं। आज जरूरत सद्भाव की है। भारत इसकी जीती जागती मिसाल है। जब यहां सभी लोग मिलकर रह सकते हैं तो दूसरे देशों में क्यों नहीं। भारत के सियासी उतार चढ़ाव पर जब कुछ लोगों ने उनसे सवाल किया तो तिब्बती धर्मगुरु का कहना था कि परिवर्तन जरूरी है।
जब परिवर्तन होता है तो समझिए लोग जागरूक हो रहे हैं। बगैर जागरूकता के परिवर्तन संभव नहीं है। धर्मगुरु ने कहा कि रमणरेती में आकर उन्हें बहुत शांति मिलती है। कार्ष्णि गुरु शरणानंद को सच्चा संत बताते हुए कहा कि वह भी समाज में शांति और भाईचारे के लिए प्रयास करते रहते हैं।