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सुरक्षा का अहसास नहीं दिला पाए अधिकारी

Thu, 30 Jul 2015 12:12 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला मथ्ाुरा/परख्ाम
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वाल्मीकि बस्ती में सन्नाटा पसरा है। घर खुले पड़े हैं, दरवाजे टूटे हुए हैं, थोड़ा-बहुत सामान बिखरा है, बाकी कुछ बचा ही नहीं। कुछ हमलावर तहस-नहस कर गए हैं, तो कुछ जान बचाकर भागते डरे-सहमे लोग अपने साथ ले गए। खौफ के साये में सांस ले रही बस्ती को जरूरत है सुरक्षा के अहसास की लेकिन पीएसी खड़ी है दूर स्टेशन पर। अधिकारियों के नाम पर सिर्फ एक सीओ मौजूद हैं। वो स्टेशन से दूर पुलिस चौकी के पास आराम से बैठे हैं कुर्सी पर।
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दोपहर के 12.30 बजे हैं। रेल लाइन के एक ओर ठाकुरों के मुहल्लों में चीख पुकार की आवाज सुनाई दे रही है। यहीं की बच्ची की दरिंदगी के बाद हत्या की गई। उसके परिवार पर गमों का पहाड़ टूट पड़ा है। लोग सांत्वना लेकर पहुंच रहे हैं। लाइन के दूसरी तरफ वाल्मीकि बस्ती में दो तरह के दृश्य हैं। जिस ओर के मुल्जिम हैं, वहां सिर्फ सन्नाटा बचा है।

इन 20 परिवारों पर हमला हुआ। अब यहां एक भी इंसान नहीं बचा। खूंटे तोड़कर भागीं गायें पास में घूम रही हैं। पास
में ही बस्ती में कुछ लोग घरों के बाहर नजर आ रहे हैं। मर्द आज काम पर नहीं गए हैं। बच्चों ने स्कूल छोड़ा है। महिलाएं मीडियाकर्मी देखते ही मुल्जिमों को कोसने लगती हैं।
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एक महिला की प्रतिक्रिया है, यू तो पतौ ई सोनू भांग पीवे, पर ऐसो बुरो काम कर देगो, जाकी सल नाई। इस बस्ती से दूर रेलवे स्टेशन पर 35-40 पुलिसकर्मी यात्रियों की बेंच पर आराम फरमा रहे हैं। मीडिया के कैमरे देखते ही खड़े होने लगे हैं।

अब एक बज चुका है, कोई अफसर बस्ती में नजर नहीं आ रहा। थोड़ी दूर चौकी पर एक सीओ तीन दरोगाओं के साथ बैठे हैं। पूछने पर कहते हैं, मैं इस सर्किल का नहीं, स्पेशल ड्यूटी पर आया हूं। जिला और तहसील से कोई अधिकारी नहीं पहुंचा है घर छोड़कर गए लोगों की वापसी कराने के लिए। डरे सहमे लोगों को सुरक्षा का अहसास दिलाने के लिए किसी अधिकारी ने उनसे बात भी करना जरूरी नहीं समझा है।
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