वृंदावन शोध संस्थान में व्याप्त अनियमितताओं का आलम यह है कि संस्थान को मिलने वाली अनुदान राशि पूरी तरह खर्च न हो पाने के बावजूद केंद्रीय स्तर से लगातार अनुदान स्वीकृत हो रहा है। ऐसी स्थिति में प्रावधान यह है कि खर्च न हो सकी अनुदान राशि को मय ब्याज के सरकार को वापस करना होता है। इसी के साथ संस्थान की ओर से वर्ष 2010 से 2013 तक ग्रंथ प्रकाशन पर जितना व्यय किया गया उससे 40 गुना अधिक व्यय उपकरणों और संसाधनों की खरीद पर कर दिया गया।
आरटीआई कार्यकर्ता और अधिवक्ता सुरेश चंद्र शर्मा को आठ मई 2013 को आरटीआई में मिले जवाब के अनुसार संस्थान ने मात्र एक पांडुलिपि का प्रकाशन ग्रंथ रूप में किया। 2010 से 2013 तक की इसी अवधि में नौ छोटी-छोटी पुस्तकों का प्रकाशन किया। इस दौरान संस्थान को केंद्र से 348 लाख रुपये और उत्तर प्रदेश सरकार से 97.25 लाख रुपये का अनुदान प्राप्त हुआ। इसमें से मात्र 8,76,965 रुपये प्रकाशन के मद में खर्च किए गए, जबकि 4,73,18,588 रुपये संसाधनों और उपकरणों की खरीद पर व्यय कर दिए गए।
उल्लेखनीय है कि ग्रंथों, पांडुलिपियों का संरक्षण और प्रकाशन संस्थान के प्राथमिक उद्देश्यों में है। सुरेश चंद्र शर्मा ने बताया कि 21 अक्तूबर 2013 को दायर आरटीआई का यह जवाब उन्हें केंद्रीय सूचना आयुक्त दिल्ली द्वारा सुनवाई के बाद आठ मई 2015 को संस्थान से प्राप्त हो सका।
इसी के साथ 2014-15 में भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अवर सचिव ने संस्थान के संबंध में यह अनुमोदन किया कि संस्थान ने 2013-14 में अपनी संपूर्ण अनुदानित राशि का प्रयोग कर लिया है। इस अनुमोदन के बाद ही वर्ष 2014-15 में संस्थान को नॉन प्लान मद में 8,33,000 रुपये की राशि का आवंटन किया गया। जबकि ऑडिट रिपोर्ट में इसके विपरीत बताया गया है कि 2010-11 से 2013-14 तक क्रमश: 6,04,480, 11,50,993, 1,17,883 और 1,56,069 रुपये संस्थान खर्च ही नहीं कर सका। संस्थान में अनियमितताओं के बावजूद केंद्रीय स्तर से अनुदान का अनुमोदन प्राप्त होता रहा।