यमुना को प्रदूषण मुक्त करने के अभियान पर अफसरों की मनमानी भारी पड़ रही है। भले ही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने यमुना को प्रदूषण मुक्त करने के लिए एक और बड़ा हथियार थमा दिया है, लेकिन प्रशासनिक अफसरों की रुचि इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा पूर्व में दिए गए आदेशों का पालन करने में भी नहीं है।
ब्रजवासियों ने काफी समय से यमुना को प्रदूषण मुक्त करने का अभियान छेड़ रखा है। इस दिशा में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने यमुना में कूड़ा फेंकने वालों पर जुर्माना लगाने का बड़ा फैसला किया। अब इसके क्रियान्वयन का दारोमदार सरकारी मशीनरी पर आगया है।
मगर शंका है कि सरकारी मशीनरी कहीं इसका भी वही हाल न कर दे जो यमुना को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेशों का हुआ है। कोर्ट ने मथुरा में यमुना में प्रदूषण को रोकने के लिए नोडल अधिकारी की नियुक्त अपने स्तर से की है परंतु यह पद भी सिर्फ बैठकों की औपचारिकता निभाने तक सीमित होकर रह गया है। यही कारण है यमुना में प्रदूषण के लिए जिम्मेदार अफसर या आम व्यक्ति के खिलाफ कोई कार्रवाई अमल में नहीं लाई गई।
ये हैं इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश
- रिवर पुलिस
यमुना में कूड़ा फैलाने वाले, जलचरों का शिकार करने वाले, किनारे पर शौच करने वालों की निगरानी करते हुए रिपोर्ट दर्ज कराएगी।
पुलिस- पालिका द्वारा मांस की बिक्री का लाइसेंस न दिए जाने की स्थिति में अवैध पशुकटान प्रतिबंधित
- प्रदूषण बोर्ड
प्रत्येक 14वें दिन उद्योगों की सैंपलिंग होगी। बगैर शोधन के उद्योगों का पानी निकलने पर उद्योग को बंद किया जाएगा।
- नगर पालिका
किसी भी दशा में एक बूंद गंदा पानी यमुना में नहीं जाना चाहिए। इसके लिए वह सभी प्रयास किए जाएं जो आवश्यक हैं।
- एमवीडीए
बगैर एसटीपी और सीवर लाइन के किसी भी कालोनी का नक्शा स्वीकृत न किया जाए।
यमुना कार्य योजना के संदर्भ में इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेशों का पालन सुनिश्चित करा दिया जाए तो मथुरा-वृंदावन में यमुना 70 से 80 प्रतिशत खुद प्रदूषण मुक्त हो जाएगी।
गोपेश्वरनाथ चतुर्वेदी
याची, इलाहाबाद हाईकोर्ट