पतवार को संभालने वाले हाथ भंवरों की सूदखोरी से सने हैं। जिले में बाल विकास परियोजना कार्यालय कुछ ऐसे ही हालात बयां करता है। सरकार ने इसे जिम्मेदारी तो बच्चों के विकास की दी थी, लेकिन इसके कार्यालय में बालक डेढ़ रुपये प्रतिदिन की मजदूरी करते पाए गए। इतना ही नहीं, यह अपराध कलेक्ट्रेट परिसर से आसपास हो रहा है। सच अफसर और नेता भी जानते हैं लेकिन जवाब में कोई टालमटोल कर रहा है तो कोई बोलने को ही तैयार नहीं।
राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त जिला पंचायत अध्यक्ष के कार्यालय से चंद कदम चलिए तो बाल विकास परियोजना कार्यालय नजर आ जाएगा। इसका भवन कलक्ट्रेट परिसर से सटा हुआ है। पास के ही सुलभ शौचालय में एक वाल्मीकि परिवार रहता है, जिसके दो मासूम बच्चे बाल मजदूरी करने को मजबूर हैं।
इनका काम है बाल विकास परियोजना के लिए आने वाली पंजीरी के बोरों को ट्रक से उतारकर कार्यालय के गोदाम में रखना। बाद में इन्हें गोदाम से छोटे वाहन में रखवाया जाता है। इसके लिए दो रुपये प्रति बोरा मजदूरी तय है लेकिन 50 पैसे प्रति बोरा इन बाल मजदूरों से कमीशन भी ले लिया जाता है। इस तरह सिर्फ डेढ़ रुपये प्रति बोरे की मजदूरी ये बाल मजदूर अफसरों के सामने कर रहे हैं।
हैरानी यह है कि सरकारी अधिकारियों की इस संपूर्ण प्रक्रिया पर जिला पंचायत अध्यक्ष भी खामोश हैं, जिनके आफिस के ठीक सामने बच्चों से सरकारी दफ्तर में बाल मजदूरी कराई जा रही है। इस संदर्भ में जब प्रभारी डीपीओ अनिल दत्ता से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि लोडिंग-अनलोडिंग की जिम्मेदारी विभाग की नहीं है। यह कार्य ट्रक चालक का है। लेकिन, वहां बाल विकास परियोजना अधिकारी (सीडीपीओ) की मौजूदगी के प्रश्न पर वे खामोश हो गए।