हरिनाम संकीर्तन के जरिए विश्व को अलौकिक प्रेम का बोध कराने वाले चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ धाम से वृंदावन की यात्रा पर निकले थे। सन 1515 में कार्तिक पूर्णिमा के दिन उनका वृंदावन आगमन हुआ। यहां पहुंच कर महाप्रभु ने ब्रजवासियों को 5000 साल पुराने भगवान श्रीकृष्ण की लीला स्थलियों के बारे में बताया और इन स्थलों का उद्धार किया।
स्वामी प्रेमानंद द्वारा रचित पुस्तक के अनुसार चैतन्य महाप्रभु अपने शिष्य बलभद्र भट्टाचार्य के साथ झारिखंड (मध्य प्रदेश के संबलपुर, गंगापुर, छोटा नागपुर, रामथाल परगना और सरभुजा क्षेत्र का तत्कालीन संयुक्त नाम) के रास्ते वृंदावन के लिए चले थे।
वे सदा कृष्ण प्रेम में रमे रहते और मुख से कृष्ण-कृष्ण कीर्तन करते हुए बढ़ते। इस दौरान वन के बाघ, हाथी, गैंडा, शूकर जैसे हिंसक पशु उनके लिए मार्ग छोड़ देते थे। भील, संथाली आदि वनवासी लोगों के गांव के गांव महाप्रभु के दर्शन कर और उनके कीर्तन को सुनकर वैष्णव बन गए।
महाप्रभु के काशी पहुंचने के बाद उनकी भेंट तपन नाम के ब्राह्मण से हुई। महाप्रभु ने उन्हें दस साल पहले बंगाल से काशी जाकर रहने का निर्देश दिया था। तपन के पुत्र रघुनाथ महाप्रभु की कृपा के पात्र बने जो आगे चलकर छह गोस्वामियों में से एक प्रधान गोस्वामी बने। जब महाप्रभु को वृंदावन व्याकुल करने लगा तो वो प्रयाग होते हुए मथुरा मंडल पहुंच गए।
राधारमण मंदिर के सेवायत अनिल गोस्वामी बताते हैं कि वृंदावन का इतिहास 5000 साल पुराना है। 500 साल पहले चैतन्य महाप्रभु ने वृंदावन पहुंचकर ब्रजवासियों को वृंदावन और प्रभु श्रीकृष्ण की लीला स्थलियों का अहसास कराया था। उन्होंने जाति, वर्ण, लिंग के बंधन तोड़कर समूचे जगत को अलौकिक प्रेम का दान दिया। अनिल गोस्वामी बताते हैं कि मथुरा में महाप्रभु ने 24 घाटों पर स्नान किया।
श्रीकृष्ण जन्मस्थान केशव देव मंदिर के दर्शन कर उनके सम्मुख संकीर्तन किया इसके बाद ब्रजयात्रा की। गोवर्धन में लुप्तप्राय राधाकुंड का पुनरुद्धार कर ब्रजवासियों को इससे परिचित कराया। कुसुम सरोवर में स्नान किया और मानसी गंगा में स्नान कर श्रीहरदेव के दर्शन किए। वे नंदगांव, कामवन, शेषशायी, चीरघाट, भांडीरवन, भद्रवन, महावन, गोकुल आदि लीला स्थलियों के दर्शन करते हुए वृंदावन आए थे।
सत्याग्रह के थे जनक
सत्याग्रह के दम पर महात्मा गांधी ने भारत को अंग्रेजों से मुक्ति दिलाई थी। चैतन्य महाप्रभु के अनुयायी महाप्रभु को सत्याग्रह का जनक बताते हैं। बताया जाता है कि चैतन्य महाप्रभु के जन्मस्थल नवद्वीप में तत्कालीन मुस्लिम शासक महाप्रभु के संकीर्तन का विरोध करते थे। कृष्ण भक्ति में रमे महाप्रभु ने फिर भी संकीर्तन जारी रखा। बाद में सभी उनके संकीर्तन में आनंदित होने लगे।