मथुरा। दिवाली के बाद ब्रज में एक बार फिर धार्मिक उत्सवों का दौर शुरू होने जा रहा है। गोपाष्टमी से शुरू हो रहे उत्सवों की देवोत्थान एकादशी तक धूम रहेगी। इसमें कंस मेला भी शामिल है। इन धार्मिक उत्सवों के लिए प्रशासनिक और आयोजनों से जुडे़ लोग तैयारियों में जुट गए हैं। खासकर चतुर्वेदी समाज कंस मेले की तैयारी उत्साहपूर्वक कर रहा है। इसके लिए देश-विदेश से चतुर्वेदी समाज के लोग मथुरा आने लगे हैं।
भगवान श्रीकृष्ण की जन्म और लीला स्थली मथुरा में उत्सवों की बारह महीना धूम रहती है। इन उत्सवों में स्थानीय लोग ही नहीं देश-विदेश से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होने आते हैं। हाल ही में दीपों के पांच दिवसीय त्योहार दिवाली और गोवर्धन पूजा में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए।
अब 11 नवंबर से उत्सवों की एक और शृंखला शुरू हो रही है। इसमें 11 नवंबर को गोपाष्टमी, 12 को अक्षय नवमी की परिक्रमा है। 13 नवंबर को कंस मेला होगा तो 14-15 नवंबर को देवोत्थान एकादशी पर लाखों लोग मथुरा-वृंदावन और गरुण गोविंद की परिक्रमा करेंगे।
गोपाष्टमी- 11 नवंबर
कार्तिक शुक्ल पक्ष अष्टमी तिथि को गोपाष्टमी के रूप में मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने गो-चारण लीला आरंभ की थी। इस बार यह पर्व 11 नवंबर को मनाया जाएगा। इस दिन बछड़े सहित गाय का पूजन करने का विधान है। माथुर चतुर्वेद परिषद द्वारा इस दिन गोचारण लीला का आयोजन किया जाता है। इसमें गोचारण शोभायात्रा निकाली जाती है, जो गली भीकचंद से पुराना बस स्टेंड तक जाती है।
अक्षय नवमी- 12 नवंबर
हिंदू धर्म में आंवला नवमी/अक्षय नवमी का विशेष महत्व माना गया है। हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के नौवें दिन अक्षय नवमी को मनाया जाता है। इस दिन दान-धर्म का अधिक महत्व होता है। पं.अजय कुमार तैलंग ज्योतिषाचार्य ने बताया कि शास्त्रों के अनुसार, आंवला नवमी के दिन आंवला के वृक्ष की पूजा की जाती है। इस दिन मथुरा की पंचकोसीय परिक्रमा का भी विशेष महत्व हैं। आसपास जनपदों से लाखों श्रद्धालु मथुरा की परिक्रमा करते हैं।
कंस मेला- 13 नवंबर
मथुरा में कंस मेला का विशेष महत्व है। प्रति वर्ष कंस टीले पर यह मेला आयोजित किया जाता है। चतुर्वेदी समाज की ओर से आयोजित इस मेले का ब्रज में विशेष आकर्षण रहता है। भगवान श्रीकृष्ण ने कंस को मारने के उपलक्ष्य में यह मेला आयोजित होता है। इस दिन चतुर्वेदी समाज के युवक अपनी लाठियों से सुसज्जित होकर कंस टीले तक जाते हैं। वहां कंस के पुतले को नष्ट करके उसके मस्तक को लाकर कंसखार पर नष्ट करते हैं, तदुपरांत विश्राम घाट पर प्रभु को विश्राम देकर पूजन आरती करके, कंस वध के दिन की स्मृति को परंपरागत रूप से साकार करते हैं।
देवोत्थान एकादशी-14-15 नवंबर
ज्योतिषाचार्य अजय कुमार तैलंग ने बताया इस बार देवोत्थान एकादशी दो दिन मनाई जायेगी। हिंदू पचांग के अनुसार, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवोत्थान एकादशी कहा जाता है। इस तिथि से ही मांगलिक कार्य प्रारंभ हो जाते हैं। देवोत्थान एकादशी तिथि 14 नवंबर को सुबह 05 बजकर 48 मिनट से प्रारंभ होगी और 15 नवंबर 2021 को सुबह 06 बजकर 39 मिनट पर समाप्त होगी। इसी दिन तीन वनों की गरूड़ गोविंद, मथुरा, वृंदावन की परिक्रमा लगाई जाती है। इस दिन तुलसी सालिगराम जी का विवाह होता है ।