ढाबे के बाहर चूल्हे पर खाना बनाते कर्मचारी।
मथुरा। मध्य एशिया में चल रहे युद्ध का असर आम लोगों की रसोई से लेकर होटल-ढातों तक तक महसूस किया जाने लगा है। ईंधन की बढ़ती कीमतों और घरेलू गैस सिलिंडरों की सीमित उपलब्धता ने होटल और ढाबा संचालकों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
बाजार में ईंधन के दाम बढ़ने से खानपान व्यवसाय पर सीधा असर पड़ा है। लागत बढ़ने के बावजूद ग्राहक बनाए रखना संचालकों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। ऐसे में कई होटल संचालक अब गैस के विकल्प के रूप में इंफ्रारेड और इंडक्शन उपकरणों का सहारा ले रहे हैं जबकि छोटे ढाबों पर पारंपरिक लकड़ी, कोयले के चूल्हे फिर से जलने लगे हैं।
अगर खाने की कीमत बढ़ाते हैं तो ग्राहक कम हो जाते हैं और पुरानी कीमत पर बेचने में घाटा उठाना पड़ता है। दोनों ही स्थितियां हमारे लिए नुकसानदेह हैं। कम कमाकर भी लोगों के साथ जीने का प्रयास कर रहे हैं। पवन राजपूत- ढाबा संचालक
गैस की बढ़ती कीमत और अनिश्चित आपूर्ति के कारण संचालन लागत काफी बढ़ गई है। मजबूरी में नए विकल्प अपनाने पड़ रहे हैं, लेकिन इससे स्वाद और गुणवत्ता पर भी असर पड़ता है। श्याम चतुर्वेदी-होटल संचालक
ईंधन संकट लंबे समय तक जारी रहा तो इसका सीधा असर आम लोगों की थाली पर पड़ेगा। फिलहाल मथुरा में हम लोग लागत और ग्राहकों के बीच संतुलन बनाने की जद्दोजहद में लगे हुए हैं। मुकेश राजपूत- ढाबा संचालक