पुरुषोत्तम मास भगवान विष्णु का सबसे प्रिय महीना है। भगवान विष्णु ने स्वयं इसे पुरुषोत्तम मास नाम दिया और अपना सबसे प्रिय महीना बताया। ब्रज भगवान का सबसे प्रिय स्थान होने के चलते ब्रज में इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। इस बार यह 17 जून से 16 जुलाई तक अधिक मास है। कथानकों के अनुसार मगध सम्राट वसु द्वारा राजगिरी यज्ञ किया गया। इस यज्ञ में वसु के पिता ब्रह्मा जी भी उपस्थित हुए।
उन्होंने भगवान विष्णु की स्तुति की। इस पर भगवान विष्णु प्रकट हुए। सभी ने मलमास में निबंध को समाप्त करने का अनुरोध किया। भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर बताया कि नदियों में गंगा, पक्षियों में गरुड़, महीनों में पुरुषोत्तम मास उन्हें सबसे प्रिय है। जो भी इस माह में धार्मिक अनुष्ठान, दान-पुण्य, जप-तप, यज्ञ आदि करेगा उसे हजार गुना पुण्य प्राप्त होगा। वायु पुराण के 13वें सर्ग में इसका जिक्र किया गया है। पुरुषोत्तम मास के संदर्भ में ज्योतिष पुराण में कहा है कि जिस मास में संक्रांति नहीं पड़ती उसे पुरुषोत्तम मास या अधिक मास कहा जाता है। इस मास में घी, गुड़, वस्त्र, कांसे के बर्तन व भूखे को भोजन कराना, मालपूआ का प्रसाद बांटना, दान करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
ब्रज में लगती 84 कोस की परिक्रमा
पुरुषोत्तम मास में समूचे ब्रज क्षेत्र में कूष्ण काल के स्थानों, देवालयों आदि में विशेष पूजा, दर्शन, आराधना होती है। यह स्थान 84 कोस में फैले हुए माने जाते हैं। इसके लिए पुरुषोत्तम मास में ब्रज 84 कोस की परिक्रमा लगाई जाती है। यह परिक्रमा मथुरा के अलावा राजस्थान के भरतपुर और हरियाणा के पलवल जिले से होकर गुजरती है।
नियत हैं परिक्रमा के स्थान
मथुरा। पुरुषोत्तम मास में लगने वाली ब्रज 84 कोस परिक्रमा के लिए स्थान, गांव, इसकी जद में आने वाले मंदिर और रास्ता पूर्व से नियत हैं। परिक्रमार्थी नियत रास्ते को ही चुनते हैं। इसमें शॉर्टकट या दूसरे रास्तों का प्रयोग नहीं करते। इसमें जंगल हो या कंकड़ यात्री पारंपरिक रास्ता अख्तियार करते हैं।
ब्रज के 12 कुंज
पुष्पा कुंज, फल कुंज, रस कुंज, मधु कुंज, गो कुंज, द्वार कुंज, नवकुंज, शशिकुंज, प्रेम कुंज, शिद्धव कुंज, लक्ष्मी कुंज, तुलसी कुंज।
ब्रज के सात समुद्र
ध्रुव सागर, गोपाल सागर, कनक सागर, गोप सागर, बैकुंठ सागर, लक्ष्मी सागर, क्षीरसागर।
ब्रज के 12 अधिवन
परमबृह्म मथुरा, राधाबल्लभ राधाकुंड, यशोदानंदन नंदगांव, नवल किशोर दानगढ़, ब्रज किशोर ललित ग्राम, राधाकृष्ण वृषभानपुर, गोकुलेंद्र गोकुल, कामधेनु बलदेव, गोवर्धन नाथजी गोवर्धन, ब्रजवट जाववट, युगल किशोर वृंदावन, राधारमण संकेतवन।
ब्रज के 40 बिहारीजी:
अजन बिहारी, अंकुर बिहारी, अप्सरा, उद्धव, कोकिला, कुंजबिहारी, किलोल, गोविंद, चिंताहरण, चंद्र, चतुर, तुष्णावर्त, दानबिहारी, दावानल, पूतना, नवलबिहारी, प्रेमबिहारी, पिता बिहारी, बांकेबिहारी, बहुल बिहारी, ब्रह्मांड बिहारी, प्रेम बिहारी, वृह्मांड बिहारी, बिछुल बिहारी, मथरोड़ बिहारी, मानबिहारी, मोर बिहारी, रासबिहारी, रसिक बिहारी, रमण बिहारी, ललित बिहारी, ब्रज बिहारी, बन बिहारी, बुद्ध बिहारी, वेदबिहारी, संकेत बिहारी, शाक बिहारी, श्री बिहारी, शृंगार बिहारी, सत्यनारायण बिहारी, शांतनु बिहारी।
ब्रज के पांच पर्वत
चरण पहाड़ी (कामवन), चरण पहाड़ी (कामर), नंदगांव (शिव), बरसाना (बृह्म,) गोवर्धन (विष्णु)।
ब्रज के सात कदमखंडी
गोविंद स्वामीजी, पिसावा, सुनहरा, करहला, गांठौली, उद्धवक्यारी, दौऊ मिलन की।
हिंडोला
श्री कुंड, करहला, संकेत, आजनोखर, रासौली, गहवरवन, वृंदावन, शेषशायी।
ब्रज के प्रमुख सरोवर
सूरज सरोवर, कुसुम सरोवर, विमल सरोवर, चंद्र सरोवर, रूप सरोवर, पान सरोवर, मान सरोवर, प्रेम सरोवर, नारायण सरोवर, नयन सरोवर।
ब्रज की सोलह देवी
कात्यायनी देवी, शीतला देवी, संकेत देवी, ददिहारी, सरस्वती देवी, वृंदादेवी, वनदेवी, विमला देवी, पोतरा देवी, नरी सैमरी देवी, सांचौली देवी, नौवारी देवी, चौवारी देवी, मथुरा देवी, मनसा देवी, बंदी की आनंदी देवी।
ब्रज के 16 महादेव
गोकुलेश्वर महादेव, चिंतेश्वर महादेव, गोपेश्वर महादेव, उतलेश्वर महादेव, चंद्रशेखर, चकलेश्वर, गोकर्णेश्वर, चक्रेश्वर, आशेश्वर महादेव, रंगेश्वर महादेव, नंदीश्वर महादेव, लंकेश्वर महादेव, पिपलेश्वर, रामेश्वर, भूतेश्वर, केदारनाथ बूड़े बाबा।