न जाने क्या मजबूरी रही होगी उस मां की, जो अपनी नन्ही की जान को नौ महीने भी कोख में नहीं रख सकी। मां की इस मजबूरी का खामियाजा सात महीने में जन्म लेने वाली मासूम पहले ही दिन से भुगत रही है। 31 अगस्त को फरह के सलेमपुर रोड पर कोई बेरहम एक दिन की नवजात को बोरे में लपेटकर कूड़े के ढेर पर छोड़कर चला गया। कीड़ों के नोचने पर जब बच्ची ने रोना शुरू किया तो लोगों ने उसकी आवाज सुनी और पुलिस को जानकारी दी। पुलिस ने उसे अस्पताल में भर्ती करा दिया। अब जिला अस्पताल के चिकित्सक बच्ची को सांसें देने में जुटे हुए हैं।
क्रिटिकल केयर यूनिट में बच्ची की देखभाल कर रहे डाॅक्टर विशाल सिंह ने बताया कि बच्ची की उम्र करीब सात महीने है। उसे पहले वृंदावन के जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 2 सितंबर को उसे वृंदावन से जिला अस्पताल के क्रिटिकल केयर यूनिट में भर्ती किया गया था। कीड़ों के काटने के कारण बच्ची बुरी तहत से जख्मी भी हो गई थी। प्रीमेच्योर होने के कारण उसका वजन करीब 900 ग्राम है। लगातार ड्रेसिंग करने से जख्म तो सही हो गए हैं, लेकिन वह खतरा अभी टला नहीं है। बच्ची को शुरू में ऑक्सीजन पर रखा गया था, लेकिन केवल दो दिन बाद ही वह सामान्य तरीके से सांसें लेने लगी है।
डाॅ. विशाल का कहना है कि चिकित्सक और नर्सिंग स्टाफ उसे पीहू कहकर बुलाता है। पीहू को शुरुआत में नली से दो एमएल दूध दिया जाता है। अब वह 10 एमएल तक दूध पीने लगी है। उसका वजन बढ़ाने के लिए आईबी फ्लूड भी दिया जा रहा है। अगर वह और तीन-चार दिन इसी तरह से दूध पीती रही तो कटोरी-चम्मच से दूध पिलाया जाएगा। इससे उसके स्वस्थ होने की प्रक्रिया में तेजी आएगी।
उन्होंने बताया कि यहां से पूरी तरह से सही होने के बाद बच्ची को बाल शिशु गृह भेजा जाएगा। वहीं से कोई दंपती प्रक्रिया पूरी कर बच्ची को अपना सकता है। फिलहाल अस्पताल में हर कोई बच्ची की स्थिति के बारे में जानकारी भावुक हो जाता है। एक तरफ जहां क्रिटिकल केयर यूनिट में भर्ती अन्य बच्चों के माता-पिता उनके लिए व्याकुल रहते हैं। वहीं, दूसरी तरफ पीहू की परवाह करने वाला चिकित्सीय स्टाफ के अलावा और कोई नहीं है। लोग कहते हैं मासूम ने आंखें खोलने से पहले ही बेरहम लोगों का घिनौना चेहरा देख लिया।