रावण का पुतला और ताजिए भी बनाते हैं नूरआलम
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शहर के आगरा रोड पर रहने वाले नूर आलम सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल हैं। वे एक ओर जहां रावण का पुतला बनाते हैं तो मोहर्रम में ताजियों का भी निर्माण करते हैं। वे कहते हैं कि एक ओर रावण बुराई का प्रतीक है जिसका लोग संहार करते हैं वहीं ताजिये हजरत हसन इमाम की शहादत का प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि दोनों ही धर्मों के इन त्योहारों में काफी समानता है। एक जहां बुराई का प्रतीक है तो दूसरे ने अपनी जान बुराई को समाप्त करने में कुर्बान कर दी थी।
शहर के आगरा रोड स्थित मोहल्ला दरीबा में नूर आलम रहते हैं। उनका परिवार आठ दशकों से रावण का पुतला और मोहर्रम के ताजिए बनाने का काम कर रहा है। दो दशक पूर्व दशहरा पर रावण और उसके परिवार का पुतला नूर आलम के पिता फुंदन खां बनाते थे। 60 वर्ष तक फुंदन खान ने रावण का पुतला और ताजिए दोनों बनाए। उनके रावण के पुतले इतने प्रसिद्ध हुए कि कई जिलों से उनके पास ऑर्डर आने लगे। पिता के साथ ही नूर आलम ने यह काम सीख लिया। लगभग 20 वर्षों से नूरआलम इस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। नूरआलम ने इस बार भी 20 फिट का रावण पुलते के साथ कुंभकरण और मेघनाथ के पुतले बनाए हैं।
नूरआलम ने बताया कि एक पुतला बनाने में बीस दिन लगते हैं। उन्होंने बताया कि पुतला बनाने की परंपरा उनके परिवार में आगे भी रहे। इसके लिए वह परिवार के बच्चों को पुतला बनाने की कला सिखा रहे हैं। पुतला बनाने के लिए रामलीला कमेटी जो भी पैसा देती है वह ले लेते हैं। कभी मोलभाव नहीं करते।
वहीं नूर आलम का परिवार ताजिए बनाने का काम भी करता है। वो कहते हैं दुनिया के सभी धर्म बुराई समाप्त करने और अच्छाई का प्रचार प्रसार करने की सीख देते हैं। धर्म के नाम पर लोगों को बांटने और हिंसा फैलाने वाले वास्तव में किसी भी धर्म के नहीं होते हैं। वे कहते हैं कि इन दोनों धर्मों के त्योहारों पर महत्वपूर्ण काम मिलने से वह खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं। दोनों ही त्योहार लोगों को बुराई के खिलाफ कभी न झुकने और उसका अंत करने की सीख देते हैं।