चूल्हा है मगर पकाने को राशन नहीं
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चूल्हा है मगर पकाने को राशन नहीं है। नगर के गोला बाजार के समीप एक दर्जन से अधिक परिवार झोपड़ी में रहने को मजबूर हैं। इन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ तो छोड़िए रहने के लिए आवास भी नहीं मिल सके हैं। कई परिवार पीढ़ियों से झोपड़ी में मजबूरी की जिंदगी गुजर बसर कर रहे हैं। मगर इधर सिर्फ पांच वर्ष में एक बार वोट लेने के बाद जनप्रतिनिधि भी नजर नहीं करते हैं।
सरकार भले ही गरीबों के लिए तमाम योजनाएं चलाने का दावा करे, लेकिन गोलाबाजार डी-टाइप कालोनी को जाने वाले रास्ते में करीब एक दर्जन से अधिक झोपड़ियों में कई वर्षों से रह रहे लोग अभी भी फांकाकशी की जिंदगी जी रहे हैं। ताज्जुब की बात है जिनके पास सर छिपाने के लिए खुद का आवास नहीं है। उन्हें विभाग से गरीबी रेखा का राशन कार्ड देने के नाम पर अमीर कहकर टहला दिया जाता है। तेज धूप हो या कड़ाके की सर्दी ये वर्षों से इन्हीं झोपड़ियों में दिनों रात गुजारने को मजबूर हैं। मंजू देवी के पति मेहनत मजदूरी कर परिवार का पालन पोषण करते हैं। मगर तीन दिनों से काम नहीं मिला तो आज वह सिर्फ चावल और उबले आलू बनाकर ही बच्चों का पेट भर रहीं हैं। रामवती का भी कुछ ऐसा ही हाल है ये जब गरीबी रेखा का कार्ड बनवाने गई तो इन्हें अमीर कहकर कार्ड बनाने से मना कर दिया गया। सामान्य कार्ड पर इन परिवारों को अभी सिर्फ मिट्टी का तेल ही उपलब्ध हो रहा है। कभी थोड़ा बहुत राशन भी मिल जाता है। हालात ये हैं कि मासूम बच्चों को भी खुले में कड़कती सर्दी में नहलाना पड़ता है।
अबकी बार आए तो दिएं ठेंगा....
झोपड़ी में रहने वाली मंजू, विकलांग वीना और प्रीती का कहना है कि वोट मांगने के समय ही बस उनकी याद आती है। उसके बाद सब भूल जाते हैं। अबकी बार आए वोट मांगवे उन्हें ठेंगा थमाएंगे।
जो परिवार सरकारी योजनाओं से वंचित रह गए हैं। उनको चिह्नित कर योजनाओं का लाभ दिलाया जाएगा।
राजेश कुमार, एसडीएम सदर