मध्य हिमालयी क्षेत्र में मिलने वाली रसेट स्पेरो
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कभी घर के आंगन में फुदकती गौरैया अब हमसे दूर होती जा रही है। लगातार कटते पेड़ों और विषैले अन्न के चलते कृत्रिम घोंसले भी अब उसे दोबारा हमारे आंगन में नहीं ला पा रहे हैं। यह पक्षी प्रेमियों के साथ ही पर्यावरण विशेषज्ञों के लिए भी चिंता का विषय है।
एक दशक पूर्व तक गौरैया हमारे आंगन में फुदकती दिख जाती थी। सुबह उसकी चीं चीं से ही नींद खुलती थी। आधुनिकीकरण के चलते तेजी से शहरों में हरियाली कम हुई। वहीं अधिक उपज पाने की चाह में लगातार कीटनाशकों के प्रयोग से जहरीले होते अन्न ने धीरे-धीरे हमारे आंगन से गौरैया को विदा कर दिया। कुछ साल पूर्व अचानक पक्षी प्रेमियों और पर्यावरण विशेषज्ञों ने इस ओर ध्यान दिया। उसके बाद तेजी से गौरैया को बचाने के प्रयास शुरू हुए। पिछले वर्ष जिले में वन विभाग और एक एनजीओ की ओर से जिले भर में साढ़े तीन हजार से अधिक कृत्रिम लकड़ी से बने घोंसले बांटे गए थे। लेकिन यह भी घरों के आंगन में गौरैया को वापस लाने में कामयाब नहीं हुए। कुछ एक घरों को छोड़ दें तो अधिकांश के यहां यह शोपीस ही बने रह गए। पर्यावरण मित्र प्रमोद दुबे बाबा कहते हैं कि गौरैया को बचाने के लिए गंभीर प्रयास करने होंगे।
जीआईसी में जीव विज्ञान पढ़ाने वाले संतोष शाक्य कहते हैं खेती में कीटनाशकों का प्रयोग बढ़ रहा है वह अन्य पशुओं और पक्षियों के लिए जहर साबित हो रहा है। हम लोगों को इनका प्रयोग कम करना होगा तभी यह प्रजातियां बचेंगी।