करहल के सब्जी मंडी रोड निवासी सरोज बाला की संघर्ष गाथा महिलाओं के लिए प्रेरणादायी है। वर्ष 1992 में सरोज के पति डा. भारत सिंह के निधन के बाद परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। बकौल सरोज जो भी जमा पूंजी थी, वह बड़े पुत्र सुधीर सिंह और पुत्री बबिता सिंह की एमबीबीएस के प्रवेश में खर्च हो गई। पति की मौत के बाद डाक्टरी कर रहे बच्चों और छोटे बेटे सुधीर सिंह की पढ़ाई की फीस का संकट आ गया लेकिन उन्होंने पति की इच्छा पूरा करने का बीड़ा उठाया। महिला होने के बावजूद उन्होंने मेडिकल स्टोर खोला। मेडिकल स्टोर चलाकर सुधीर और बबिता को डाक्टर और संजय सिंह को इंजीनियर बनाया।
घिरोर की 76 वर्षीय ईश्वर देवी गुप्ता संघर्ष गाथा भी एक मिसाल है। 12 साल की उम्र में उनकी शादी रामकृष्ण गुप्ता के साथ हुई थी। रामकृष्ण ने कोई काम नहीं किया तो दो वक्त की रोटी का संकट आ गया। ऐसे में बच्चों का पालने के लिए उन्होंने पहले दूध बेचा। बाद में कचौड़ी की ठेल लगाने लगीं। अपनी कमाई से पति की जरूरतों को पूरा करने के साथ उन्होंने दो पुत्रों और तीन पुत्रियों को पढ़ाया और उनकी शादी की। करीब 12 साल पूर्व पति की मौत हो जाने के बाद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अनाज और देशी घी का कारोबार शुरू किया। बुढ़ापे में भी ईश्वर देवी अनाज का कारोबार कर परिवार के 14 सदस्यों का भरण पोषण कर रही हैं।
10एमएनपी 25ए: रुखसाना बेगम।
10एमएनपी 25बी: सरोजवाला।
10एमएनपी 25सी: ईश्वर देवी गुप्ता।