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महोबाः सोलह क्रांतिकारियों को इमली के पेड़ पर दी गई थी फांसी

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उपेक्षित पड़ा हवेली दरवाजा शहीद मेला स्थल - फोटो : MAHOBA
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महोबा। शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा। किसी शायर की यह पंक्तियां अब बेगानी सी लगने लगी है। शहर में स्थित हवेली दरवाजा मैदान सालों पुरानी स्वाधीनता आंदोलन की यादों को संजोए है।
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प्रथम स्वाधीनता संग्राम में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विद्रोह करने वाले 16 क्रांतिकारियों को मैदान पर लगे इमली के पेड़ों पर फांसी पर लटका दिया गया था। क्रांतिकारियों की शहादत को प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ जिले के लोग भी भूल गए। उनकी याद में आज तक कोई स्मारक भी नहीं बनाया गया।
अंग्रेजी शासन के खिलाफ बगावत करने वाले कस्बा ज्योराहा के कल्लू व लाखन समेत 16 क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने हवेली दरवाजा प्रांगण में इमली के पेड़ों पर सूली में चढ़ा दिया था। क्रांतिकारियों ने हंसते-हंसते देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। इन क्रांतिकारियों के स्मारक के निर्माण के लिए स्वतंत्रता सेनानी स्व. उमादत्त शुक्ला ने भी पहल की थी।
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वर्ष 1996 में तत्कालीन जिलाधिकारी उमेश सिन्हा ने हवेली दरवाजा मैदान पर शहीद स्मारक बनाए जाने का निर्णय लिया था। भूमि के स्वामित्व को लेकर लंबरदारों ने हवेली दरवाजा मैदान को अपनी जमीन बताते हुए न्यायालय का सहारा लिया था। इसके चलते स्मारक का निर्माण नहीं हो सका।
वर्ष 2019 में पालिका प्रशासन ने उस जगह को नगर पालिका की जमीन बताते हुए स्मारक निर्माण के लिए टेंडर प्रक्रिया कराई। नगर पालिका ने 32 लाखरुपये का एस्टीमेट तैयार कर बाकायदा टेंडर प्रक्रिया भी पूरी करा ली। इसके विरोध में जमीन पर दावा करने वाले नईम लंबरदार ने न्यायालय से स्थगन आदेश ले लिया। इससे अधिकारियों और करीब एक साल तक अनशन पर डटे रहे तारा पाटकार की उम्मीदों पर पानी फिर गया।
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