लोहिया गांवों में लाखाें रुपये की लागत से बनाए गए शौचालय बेकार साबित हो
रहे हैं। ग्रामीणाें शौचालय बनने के बाद भी खुले में शौच की आदत को नहीं
बदल पा रहे हैं। नतीजतन घर-घर बनाए गए शौचालयाें का कोई उपयोग नहीं हो रहा
है।
मालूम हो कि निर्मल भारत अभियान के तहत गांव-गांव को साफ सुथरा
करने की गरज से शासन ने लोहिया ग्रामाें में शौचालयाें का निर्माण कराया
था।
इसके अलावा अन्य गांवाें में भी शौचालय बनाए गए थे लेकिन
ग्रामीणों के लिए लाखों रुपये की लागत से बनाए गए शौचालयाें का कोई उपयोग
नहीं हो रहा है। वे आज भी खुले में शौच क्रिया कर रहे हैं।
पूर्व
में गांव-गांव में शौचालय बनाकर मैला ढोने की प्रथा को समाप्त किया गया था।
इसके बाद लोहिया गांवाें में भी शौचालयाें का निर्माण कराया गया।
मैला
ढोने की प्रथा तो खत्म हो गई लेकिन अब ग्रामीणों ने सड़क किनारे और गांव
के बाहर शौच क्रिया के लिए जाना शुरू कर दिया है। जिससे रोड के किनारे
गंदगी से पटे पड़े रहते हैं। इससे संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
शासन प्रशासन के लाख प्रयास के बाद भी इस पर अंकुश नहीं लग पा रहा है।