महोबा। बुंदेलखंड के लोक कवि ईसुरी ने जनपद महोबा में रहकर ही फाग गायन की रचनाएं लिखीं थीं। ईसुरी का बचपन तहसील कुलपहाड़ के लोहरगांव में बीता। आज भी होली पर चौपालों में ईसुरी की फागें सबसे ज्यादा सुनाई देती हैं। हिंदी के पाठ्यक्रम में ईसुरी का लिखा काव्य मौजूद है। जिसका छात्र-छात्राएं अध्ययन करते हैं।
शहर के सेवानिवृत्त संग्रह अमीन कुंवर बहादुर चौरसिया ने बताया कि वह अपने बचपन से ही चौपालों में आयोजित होने वाली ईसुरी की रचित फागों को सुनने जाते थे। ईसुरी की फागें अपनी सरल और सहज अभिव्यक्ति के लिए दशकों से सराही जाती रही हैं। कुंवर बहादुर चौरसिया ने बताया कि ईसुरी का जन्म जनपद झांसी की तहसील मऊरानीपुर की ग्राम मेढ़की में 18वीं शताब्दी में हुआ था। ईसुरी के निसंतान मामा भूधर नायक उनका भरण पोषण करने व अपना सहारा बनाने के लिए उन्हें जनपद महोबा की तहसील कुलपहाड़ के लोहरगांव ले आए थे। जहां ईसुरी फाग मंडली से जुड़कर फाग गायन व फाग की रचना करने लगे थे। ईसुरी का विवाह बगौरा के पुरोहित पं. रामप्रसाद की बेटी श्यामा से हुआ। इसके बाद वह बगौरा में रहने लगे और बगौरा के जमीदार चतुर्भुज लंबरदार के यहां कारिंदा बनकर काम करने लगे। इस दौरान ईसुरी ने एक से बढ़कर एक फागों की रचनाएं लिखीं। कुंवर बहादुर चौरसिया ने महाकवि ईसुरी की फागों का संकलन किया। इसके अलावा उन्होंने स्वयं भी फागें लिखीं। कुंवर बहादुर चौरसिया की लिखी पुस्तक महोबा की फाग संग्रह आज भी लोगों की पसंद बनी हुई हैं। ईसुरी की फाग गोरी नैन तोरें उरझैला, छले छबीले छैला, गैलारन पे चोट करत हैं, दिखा-दिखा दो घैला, हंस मुस्कान दिखा कैं कर दये, सबई गांव दबकैला, इनसै जस न होय ईसुरी, आगे अपजस फैला, जब चौपाल पर सुनाई देती है तो लोगों में होली का अनूठा आनंद देखने को मिलता है।
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अनूठी है बुंदेलखंड की होली
महोबा। कुंवर बहादुर चौरसिया ने बताया कि बुंदेलखंड की होली अपने आप में अनूठी होती है। पारंपरिक रंगों के साथ बुंदेलखंड के लोक कवि ईसुरी और गंगाधर व्यास की फागें व बुंदेली लोकगीतों पर ढोल नगाड़ों के साथ मस्ती प्रधान होती है। यहां होली में ढोल नगाड़ों के साथ हुड़दंग ज्यादा होता है। होली में चौपालों में फाग गायन होता है। जिसमें ईसुरी की फागें प्रमुखता से गाई जाती हैं।