महोबा। जिले के युवा प्रतिदिन औसतन सात से आठ घंटे स्क्रीन पर बिता रहे हैं। इसका सीधा असर उनकी नींद पर पड़ा है। इससे उनमें कम उम्र में भूलने की बीमारी के लक्षण तेजी से उभर रहे हैं। जिला अस्पताल में संचालित मन कक्ष की ओपीडी में प्रतिदिन अनिद्रा की समस्या से ग्रसित पांच से 10 मरीज उपचार के लिए आ रहे हैं।
मन कक्ष के चिकित्सीय परामर्शदाता प्रेमदास ने बताया कि रात के समय मोबाइल और लैपटॉप से निकलने वाली सफेद व नीली रोशनी मस्तिष्क को यह संकेत देती है कि अभी दिन है। इससे नींद के लिए जिम्मेदार हार्मोन का संतुलन बिगड़ जाता है। काउंसलिंग से पता चला है कि युवा और महिलाएं सबसे ज्यादा पीड़ित हैं। इससे उनका कीमती समय पढ़ाई या काम के बजाय बार-बार सोशल मीडिया पर रील देखने व स्क्रॉल करने में बर्बाद हो रहा है। उन्होंने बताया कि सात से आठ घंटे की गहरी नींद मस्तिष्क के लिए संजीवनी है। नींद के दौरान मस्तिष्क से हानिकारक टॉक्सिक (विषाक्त पदार्थ) बाहर निकलते हैं। पर्याप्त नींद न लेने से ये टॉक्सिक मस्तिष्क में जमा होने लगते हैं, इससे डिमेंशिया यानी भूलने का रोग और मानसिक धुंधलापन कम उम्र में ही युवाओं को घेर रहा है।
नैदानिक मनोवैज्ञानिक डॉ. अंकिता गुप्ता ने बताया कि अनिद्रा केवल याददाश्त ही नहीं बल्कि युवाओं के व्यवहार को भी बदल रही है। चिड़चिड़ापन, अचानक गुस्सा आना और एकाग्रता में कमी जैसे लक्षण पाए जा रहे हैं। अनिद्रा के उपचार के लिए सबसे पहले स्क्रीन टाइम को कम करना होगा। सोने से एक घंटा पहले सभी डिजिटल उपकरणों को बंद कर दें और यदि सप्ताह में तीन बार से अधिक नींद खराब हो रही है, तो तुरंत डॉक्टर की सलाह लें।