महबा। शासन-प्रशासन की अनदेखी के चलते ऐतिहासिक सहस्त्र गोवर्धन्नाथ जू मेले का स्वरूप बिगड़ता जा रहा है। जिससे इस प्रसिद्ध मेले में अब पहले जैसी भीड़ नहीं जुटती और न ही मेले में दूर-दराज के बडे़े दुकानदार आते हैं। लाख प्रयास के बाद भी इसे राजकीय मेले का दर्जा नहीं मिल सका।
1883 में रियासत कालीन से चरखारी के भव्य मेला लगा। चरखारी मेले के नाम पर फिरोजाबाद, लखनऊ, आगरा के अलावा मध्यप्रदेश के कई जिलों से लोग बड़ी-बड़ी दुकानें और झूले लेकर चरखारी मेले में आते थे। चरखारी मेले के नाम पर आज भी लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन सुविधाएं नहीं मिलतीं। उल्टा स्कूली छात्रों और दबंगों द्वारा जबरन फ्री में कार्यक्रम देखे जाते हैं। इससे दूर के कलाकारों व दुुकानदारों ने मेले में आना कम कर दिया है।
एक माह चलने वाले चरखारी मेले की अलग पहचान है। इतिहासकार शिवकुमार गोस्वामी का कहना है कि मेले की भव्य व्यवस्थाएं धनाभाव के चलते टूट गई हैं। नगर पालिका चरखारी द्वारा इस मेले के आयोजन के लिए लाखों रुपये खर्च करके इसे जीवित रखे हुए हैं। मेले के स्वरूप को पुन: भव्यता प्रदान करने की जरूरत है। अधिवक्ता नबी अहमद का कहना है कि संगठित प्रयासों से इस मेले को फिर से सजाया, संवारा जा सकता है। आने वाले कलाकारों को रियायत दी जाए।