उत्तर भारत के मशहूर ऐतिहासिक कजली मेले का शनिवार
रात समापन हो गया। एक सप्ताह तक आल्हा मंच पर प्रस्तुत किए गए बुंदेली कार्यक्रमों का
दर्शकों ने लुत्फ उठाया।
आल्हा मंच पर बुंदेली कलाकारों को अपनी प्रतिभाओं
को प्रदर्शित करने का मौका मिला। 834 साल पुराने ऐतिहासिक कजली मेले को
दो साल पहले राजकीय मेले का दर्जा प्राप्त होने के बाद प्रशासन भी
कजली मेले में रुचि लेने लगा।
यही वजह है कि जिला प्रशासन ने मेला परिसर
में सांस्कृतिक मंच बनाकर कवि सम्मेलन, आल्हा गायन, लोक नृत्य सहित तमाम
कार्यक्रम आयोजित कराकर 3 सितंबर को कार्यक्रमों का समापन करा दिया गया था।
आल्हा
परिषद के अध्यक्ष दाऊ तिवारी ने बताया कि आल्हा मंच पर लोक नृत्य, बुंदेली
नृत्य, राई नृत्य, डिमरियाई नृत्य, आल्हा गायन, ख्याल व अन्य बुंदेली गीत
संगीत की एक सप्ताह तक धूम मची रही।
बुंदेली कलाकारों को खानपान से लेकर
ठहरने की व्यवस्था आल्हा मंच ने की। यहां पर बुंदेली विधाओं का एक सप्ताह
तक दूरदराज से आए दर्शकों ने आनंद लिया।
शनिवार की रात को उपजिलाधिकारी सदर
प्रबुद्ध सिंह और नरसिंह कुटि के महंत विशम्भरदास ने कजली मेले का समापन
कराया। जहां पर महंत विशम्भरदास और एसडीएम को आल्हा मंच के अध्यक्ष ने
स्मृति चिन्ह भेंट किया। बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।