उत्खनन होता तो राजधानी गांव बन जाता पर्यटन स्थल
महराजगंज। करीब 17 साल पहले पुरातत्व विभाग ने राजधानी गांव में उत्खनन किया था, तो कुषाण, शुंग, मौर्य, गुप्त कालीन मूर्तियां, सिक्के और खिलौने मिले थे। इन्हें लखनऊ संग्रहालय में रखा गया है। इसके बाद से कोई इस गांव में झांकने तक नहीं आया। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि इस जगह पर ठीक से उत्खनन किया जाता, तो यह स्थल पर्यटन के रूप में विकसित जाता।
जिले के लक्ष्मीपुर ब्लॉक से पश्चिम में करीब छह किमी की दूरी पर राजधानी गांव स्थित है। इस गांव में एक टीला है, जिसे प्राचीन काल का बताया जाता है। वर्ष 2005 में राज्य पुरातत्व विभाग लखनऊ की टीम ने टीले के आसपास उत्खनन किया, तो करीब 2800 वर्ष पहले की सभ्यता वाला प्राचीन बौद्ध स्तूप मिला था। इतिहासकार मानते हैं कि यह पुरानी सभ्यता को दर्शाता है।
क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी नरसिंह त्यागी ने बताया कि शासन के निर्देश पर वर्ष 2005 में राजधानी गांव में करीब 350 मीटर के दायरे में तीन स्थानों पर उत्खनन किया गया था। खुदाई में मिट्टी के टूटे-फूटे बर्तनों, हड्डियों, मनकों और मृण मूर्तियों के ढेर मिले थे। करीब 45 दिन चले उत्खनन में मिले अवशेषों का जब विश्लेषण किया गया, तो लगभग 2800 साल पहले की संस्कृतियों (शुंग, कुषाण, मौर्य, गुप्त) के उतार-चढ़ाव की कहानी सामने आई।
उन्होंने बताया कि मिट्टी के फर्श पर बने चूल्हे और जले अनाज, बिखरी हड्डियां उस समय के लोगों के आहार व्यवहार के बारे में बताते हैं। मुद्रा, मिट्टी के पहिए, शतरंज की गोटियां, कटोरे, जग, लोटा, नायिका की मूर्ति, सिक्के, सुराही, दवात, मटके, छल्लेदार कुआं, ईंट की दीवारों का मिलना साबित करता है कि यहां पर कोई बस्ती आबाद थी।
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विकास पर नहीं दे रहा कोई ध्यान
लक्ष्मीपुर। देवदह रामग्राम बौद्ध विकास समिति के अध्यक्ष जितेंद्र राव ने बताया कि बार-बार शासन प्रशासन से गांव के विकास की मांग की जा रही है, लेकिन कोई ध्यान नहीं दे रहा है। ग्राम पंचायत राजधानी के प्रधान अमन शुक्ल ने बताया कि गांव में खुदाई के दौरान मिलने वाले अवशेषों से पता चलता है कि पुरानी सभ्यता थी। गांव के ऐतिहासिक टीले का विकास हो जाता तो ग्रामीणों को रोजगार के अवसर मिलते। संवाद
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उत्खनन में मिले अवशेषों के आधार पर कहा जा सकता है कि राजधानी गांव का टीला गौतम बुद्ध काल से पहले आबाद रहा होगा। यह आबादी लगभग 800 ईशा पूर्व से गुप्त काल तक बनी रही। उत्खनन में मिले अवशेष लखनऊ स्थित पुरातत्व विभाग के कार्यालय में सुरक्षित हैं।
- नरसिंह त्यागी, क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी गोरखपुर