फरेंदा रोड पर सुबह-शाम चलती है रोडवेज बस, उसका भी समय निर्धारित नहीं, टेंपो ही आवागमन का सहारा
जोखिम के साथ ही दुश्वारियों भरा है शहर से फरेंदा तक 30 किमी का सफर, टेंपो-टैक्सी में 12 रुपये अधिक लगता है किराया
संजय कुमार पांडेय
महराजगंज। जिले की एक तहसील है फरेंदा। शहर से इसकी दूरी करीब 30 किलोमीटर है। इस रूट पर रोडवेज की केवल एक बस चलती है, वह भी सुबह-शाम। इसके जाने और आने का कोई समय तय नहीं है। इस वजह से शहर से फरेंदा और फरेंदा से शहर आने-जाने वालों को ऑटो और निजी बसों से यात्रा करनी पड़ती है, जोकि बेहद कष्टप्रद होती है। 30 किमी की यात्रा में एक घंटे से अधिक समय लग जाता है और जान हर पल हथेली पर रहती है।
शहर से फरेंदा रूट पर आने-जाने वालों का आरोप है कि रोडवेज सेवा की बदहाली का फायदा निजी बस और ऑटो वाले उठा रहे हैं। रोडवेज की बसें नहीं चलने की वजह से लोगों को निजी बसों और ऑटो में सफर करना पड़ रहा है। ऑटो हो या निजी बस सब में सवारियों को भूसे की तरह भरा जाता है। गर्मी में एक दूसरे के गंधाते पसीने के बीच सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है। निजी बसों में तो अधिकतर यात्रियों को खड़े होकर यात्रा करनी पड़ती है।
फरेंदा रूट पर करीब 50 ऑटो और छह निजी बसें चलती हैं। रोडवेज बस का किराया 38 रुपये और निजी बस का किरया 50 रुपये है। ऑटो वाले भी प्रति सवारी 50 रुपये किराया लेते हैं। स्टैंड तक पहुंचने के लिए 12 रुपये अतिरिक्त खर्च करने पड़ते हैं। निजी बसें हों या ऑटो यह स्टैंड से तभी चलते हैं जब यात्रियों से ठसाठस भर जाते हैं।
सोमवार को शहर से फरेंदा रूट पर चलने वाले यात्रियों की समस्याओं को जानने की कोशिश की गई। शहर के चौपरिया स्टैंड पर करीब 10:30 बजे पहुंचने पर निजी बस नहीं मिली। यहां पर गेरूआ रंग का गमछा गले में डाले गणेश मिल गए। देखते ही पूछा कि भैया कहां जाना है? जल्दी आगे वाले टेंपो में बैठ जाइए, नहीं तो वह भी नहीं मिलेगा। टेंपो के करीब जाने पर उसमें यात्री भरे हुए थे। यात्रियों में महिलाएं और बच्चे भी थे। बैठने की जगह नहीं थी, इसलिए रुकना पड़ा।
टैक्सी स्टैंड की तरफ जाने पर एक ऑटो में खुटहा जाने के लिए सवारी भरी जा रही थी। ऑटो में तीन बच्चों सहित 13 यात्रियों काे बैठाया गया था। परिसर में कहीं बस नहीं दिखी। गणेश ने बताया कि बसें अयोध्या चली गई हैं। इस वजह से समस्या है। बातचीत के दौरान एक टेंपो किनारे आकर खड़ा हुआ। अधिकतर यात्री फरेंदा जाने के लिए इधर-उधर खड़े दिखे।
चालक राहुल ने कहा कि भैया फरेंदा सीधे चल रहा हूं। बैठ जाइए नहीं तो जगह नहीं मिलेगी। 10:50 बजे टेंपो महराजगंज स्टैंड से चला तो उसमें बच्चों समेत 16 यात्री बैठे थे। ओवरलोड होने के बाद चालक आगे बढ़ा तो गति बढ़ने पर टेंपो लहरा रहा था। आगे बढ़ने पर केएमसी डिजिटल अस्पताल के सामने एक महिला खड़ी थी। उसने ऑटो को रुकने का इशारा किया, लेकिन चालक सीधे चला गया।
आईटीएम कॉलेज चेहरी के पास ऑटो रुका तो एक छात्र उतरा। किराये को लेकर किचकिच करने लगा। चालक ने कहा कि भैया जो हो वही दे दो। छात्र ने 20 रुपये दिए और चला गया। आगे बढ़ने पर चालक ने थोड़ी गति बढ़ा दी। त्रिमुहानी पुल पर टेंपो अचानक एक तरफ झुका तो यात्रियों की धड़कनें बढ़ गईं। महदेवा चौराहे पर एक महिला यात्री टेंपो से उतरी। शिकायती लहजे में कहा कि बैठने में बहुत परेशानी हुई। टेंपो से सफर करने लायक नहीं है।
टेंपो चालक आगे बढ़ा तो उसका फोन आ गया। पहली दफा उसने फोन नहीं उठाया, लेकिन जब दोबारा फोन आया तो बात करने लगा। वह आराम से बातें करते हुए आगे बढ़ रहा था कि सामने ट्रक आ गया, उसने फोन रख दिया। बीच में दो स्थानों पर टेंपो चालक ने दो यात्रियों को बैठाया। फरेंदा पहुंचने से पहले डायवर्जन के पास टेंपो को बेहद संभालकर आगे ले जाना पड़ा। पुल का निर्माण होने से किनारे से रास्ता बनाया गया है। आगे बढ़ने पर ओवरब्रिज के पास दो पुलिस वाले टेंपो चालक को रुकने के इशारा किए, उसने गति धीमी की तो उसे आगे बढ़ने के लिए कह दिया। संभवत: पुलिस कर्मी बैठकर आगे जाना चाहता था, लेकिन सवारी भरी होने के कारण नहीं बैठा। फरेंदा कस्बे में दुर्गा मंदिर के पास टेंपो 11:50 बजे पहुंचा। यात्री उतरने लगे और चालक उनसे 50 रुपये किराया लेकर टेंपो को किनारे खड़ा कर दिया। फरेंदा से वापस शहर आने में भी लगभग ऐसी ही दुश्वरियों का सामना करना पड़ा। संवाद
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हर माह करीब 15 हजार रुपये होती है आमदनी
एक टेंपो चालक ने बताया कि एक चक्कर में औसतन 550 रुपये मिल जाते हैं। दूसरी तरफ से आने पर कोई निश्चित नहीं रहता है। एक दिन में मुश्किल से दो चक्कर लग पाता है। ईंधन, स्टैंड व खर्चा काटकर महीने में करीब 15 हजार रुपये बच जाते हैं। बताया कि अब यह भी काम पहले जैसे नहीं रह गया है।
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फरेंदा से आने पर दो बार बदलना पड़ा ऑटो
फरेंदा से शहर आने में दो बार ऑटो बदलना पड़ता है। पूरी तरह भर जाने पर ही ऑटो स्टैंड से चलता है। हालांकि ओवरब्रिज के पास बैठने की जगह मिल जाती है। समस्या यह होती है कि टेंपो फरेंदा से सीधे महराजगंज के लिए नहीं मिलता है। टेंपो महदेवा चौराहे तक ही आता है, इसके बाद टेंपो से महराजगंज आना पड़ता है। खुटहा की तरफ से आने वाले टेंपो भी पकड़ी में सवारी उतार देते हैं। खास बात यह है कि टेंपो बदलने में किराया नहीं बढ़ता है।
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ज्यादातर चालकों में दिखा समरता का भाव
स्टैंड के अलावा रास्ते में चौराहों पर चालकाें में समरता का भाव दिखा। शहर से आगे बढ़ने पर पकड़ी चौराहे पर चालक खुटहा की ओर से आने वाले यात्रियों को बैठाते हैं। इसी तरह से खजूरिया, महदेवा चौराहे पर भी समरसता दिखी। चालकों ने एक-दूसरे से सेटिंग कर रखी है। यात्रियों की अदला-बदली कर आपस में किराया साझा कर लेते हैं। यात्री को कोई परेशानी नहीं होती है।
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यात्रियों को झेलनी पड़ती हैं दुश्वरियां
फरेंदा रोड से यात्रा करने वाले लोगों को दुश्वारियां झेलनी पड़ती हैं। इस रूट पर करीब सात निजी बसें और 50 से अधिक टेंपो-टैक्सियां चलती हैं। खचाखच भरे टेंपो में महिलाओं को असहज स्थिति का सामना करना पड़ता है। मुनाफा कमाने के लालच में ज्यादा यात्रियों को भर लेते हैं, इससे टेंपो के पलटने का खतरा भी रहता है।
महराजगंज दवा कराने आया हूं। 50 रुपये किराया भी खर्च हुआ। आने में डर लग रहा था की कहीं टेंपो पलट न जाए। समस्याओं से जूझना आदत बन गई है।
-जितेंद्र कुमार, फरेंदा
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फरेंदा तक आने में कोई परेशानी नहीं होती है, लेकिन फरेंदा से महराजगंज आने में परेशानी झेलनी पड़ती हैं। घंटे भर इंतजार के बाद साधन मिलता है।
-नबी अहमद, नौतनवा
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रोडवेज बस चार से पांच चक्कर लगाती तो काफी हद तक समस्या दूर हो जाती, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। इस वजह से समस्या बढ़ गई है।
-अनिल कुमार शाही, फरेंदा
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ठूंस कर सवारियां भरने के बाद ही चालक आगे बढ़ते हैं। निजी बस का भी यही हाल है। उसमें तो कम दूरी वालों को खड़े होकर सफर करना पड़ता है।
-राधिका, गोपी कांध
यातायात नियमों का पालन नहीं करने पर कार्रवाई की जाती है। सड़क पर ओवरलोड वाहन संचालित नहीं होने दिया जाएगा। अगर ऐसी बात है तो जांच के बाद कार्रवाई की जाएगी।
-रवि त्यागी, प्रभारी एआरटीओ