महराजगंज। मुंशी प्रेमचंद ने हिंदी साहित्य को उपन्यास, कहानी, नाटक और लेखों के माध्यम से समृद्ध किया। उन्होंने भारतीय ग्रामीण जीवन सामाजिक मुद्दों और स्वतंत्रता संग्राम को अपनी रचनाओं का विषय बनाया। उनकी सरल भाषा और स्वाभाविक पात्रों के अनुकूलता की स्थिति को आमजन ने पसंद किया। वह कालजई कहानियों के प्रणेता थे।
ये बातें दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय गोरखपुर के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर जनार्दन धामिया ने कही। वह मुंशी प्रेमचंद और गोस्वामी तुलसीदास की जयंती के अवसर पर शुक्रवार को रामपुर बुजुर्ग स्थित ग्राम स्वराज पुस्तकालय में गोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने एक संवेदनशील लेखक सचेत नागरिक और कुशल वक्ता के रूप में समाज को जो योगदान दिया वह अतुलनीय है।
कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर अमरनाथ ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य समाज के हर वर्ग को जागरूक करने और उन्हें अपने अधिकारों के प्रति सचेत करने का प्रयास करता है। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय गोरखपुर के हिंदी के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रामनरेश राम ने कहा कि युग की सीमा के अनुसार प्रेमचंद की परिकल्पना लोक कल्याण और सर्व समावेशी के रूप में किया जा सकता है।
सीजे थॉमस ने कहा कि इस तरह के गोष्ठियों के अतिरिक्त प्रेमचंद के साहित्य को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया जाना चाहिए। इस दौरान डॉ. घनश्याम शर्मा, डॉ. परशुराम गुप्त, डॉ. शांतिशरण मिश्रा, डॉ. सुनीता, डॉ. एसके वर्मा, डॉ. पूनम वर्मा, देवेश पांडे मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन सुरेंद्र पटेल ने किया। संवाद