13 साल की उम्र में थामी थी स्वाधीनता की मशाल
महराजगंज। स्वाधीनता आंदोलन में पूर्वांचल के गांधी प्रोफेसर शिब्बन लाल सक्सेना का योगदान अविस्मरणीय रहेगा। गर्व की बात है कि प्रोफेसर शिब्बन लाल सक्सेना जैसी महान शख्सियत ने इस तराई क्षेत्र में जन्म लिया। अंग्रेज उनके नाम से कांपते थे। महज 13 साल की उम्र में प्रोफेसर सक्सेना स्वाधीनता आंदोलन का मशाल लेकर निकल पड़े थे। गणेश शंकर विद्यार्थी की प्रेरणा से आजादी की लड़ाई में शामिल हुए थे। उनकी याद में जवाहर लाल नेहरू पोस्ट ग्रेजुएट कालेज खेल मैदान में समाधि स्थल बनाया गया है। शहर का मुख्य तिराहा सक्सेना चौक के नाम से जाना जाता है।
15 अप्रैल 1919 में कानपुर में जलियावाला बाग हत्याकांड के विरोध में हड़ताल का आह्वान किया गया था। उस वक्त प्रो. सक्सेना विद्यार्थी थे। उनकी उम्र महज 13 साल थी। 1920 में जब असहयोग आंदोलन शुरू हुआ तो कानपुर के सरकारी स्कूल में पढ़ रहे प्रो. सक्सेना ने स्कूल का बॉयकाट करते हुए आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। मजदूर सभा का गठन हुआ, जिसमें प्रमुख सहायक बने। 1925 में गणेश शंकर विद्यार्थी के निर्देशन में प्रो. सक्सेना ने आजादी की लड़ाई में योगदान दिया। नमक सत्याग्रह के बाद वह विदेशी कपड़ों के बहिष्कार में जुटे। अनुमान के मुताबिक 46 करोड़ के विदेशी कपड़ों को सील कर बहिष्कार किया गया। लगान बंदी आंदोलन में उन्हें 6 जनवरी 1932 को दो साल की जेल हुई। उन्हें गणेश शंकर विद्यार्थी के साथ हरदोई जेल में बंद कर दिया गया था। 1931 में गणेश शंकर विद्यार्थी की शहादत के बाद प्रो. सक्सेना स्वाधीनता आंदोलन की कमान संभाली। अंग्रेज उनके नाम से कांपते थे। वर्ष 1931 में सेंट एड्रयूज कॉलेज से त्यागपत्र देने के बाद बापू के आह्वान पर प्रो. सक्सेना महराजगंज को अपनी कर्मभूमि बनाया। उन्होंने अंग्रेजों एवं जमीनदारों के खिलाफ लोगों को लामबंद किया। मई 1931 में जमीनदारों ने खेसरारी गांव में लूटपाट करवाई। 13 जुलाई 1906 को जन्मे प्रोफेसर सक्सेना का निधन बीमारी के कारण 20 अक्तूबर 1985 को लखनऊ बलरापुर अस्पताल में हुआ था।
जवाहर लाल नेहरू पोस्ट ग्रेजुएट कालेज रक्षा अध्ययन विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. पीआर गुप्त कहते हैं कि प्रो. सक्सेना 13 साल जेल और 26 माह फांसी की काल कोठरी में बिताए। यह 19 बार गिरफ्तार किए गए थे। अंग्रेजों के आगे कभी नतमस्तक नहीं हुए।