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Maharajganj News: जमीन लेकर नौकरी दी फिर भूल गया मिल प्रबंधन, भुगतान के लिए भटक रहे कर्मी

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महराजगंज। निचलौल स्थित गड़ौरा चीनी मिल प्रबंधन पर अपने ही कर्मियों से किए गए एग्रीमेंट की शर्त व श्रम कानून तोड़ने का आरोप है। आरोप है कि मिल ने निर्माण के समय क्षेत्र के लोगों से जमीन लेकर बदले में नौकरियां तो बांट दीं लेकिन अब न तो वादा निभा रहा है और न ही बकाया भुगतान दे रहा है।
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पूर्वांचल मिल मजदूर यूनियन के अध्यक्ष नवल किशोर मिश्रा के मुताबिक, गड़ौरा चीनी मिल का निर्माण ओसवाल ग्रुप ने कराया था। मिल बनकर तैयार हुई तो इसे जवाहर जायसवाल को 1996 में बेच दिया गया। ओसवाल ने मिल निर्माण की भूमि किसानों से नौकरी देने के एग्रीमेंट पर लिया था। 1997 में मिल ने पेराई शुरू की। ओसवाल की तरफ से कुल 290 लोगों से चार से पांच डिस्मिल जमीन लेकर डेली वेज और परमानेंट श्रेणी में नौकरियां दी गईं। 2012 तक सभी को समय पर भुगतान होता रहा लेकिन उसके बाद मिल प्रबंधन ने कर्मचारियों का वेतन, ग्रेच्युटी, पीएफ और अन्य मदों का भुगतान रोक दिया।
उन्होंने आरोप लगाया कि तमाम कर्मियों को परमानेंट की जगह डेली वेज पर किया तो किसी को सेवानिवृत्त के बाद भी भुगतान नहीं किया। आज भी करीब 250 कर्मचारी इस उम्मीद में मिल से जुड़े हैं कि उन्हें उनका हक मिल जाएगा। भुगतान को लेकर अब तक तीन बार यूनियन ने पेराई सत्र का बहिष्कार किया, लेकिन हर बार जिला प्रशासन ने हस्तक्षेप कर मिल प्रबंधन से भुगतान का समझौता करा दिया।
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श्रम विभाग के नोटिस का भी नहीं मिला लाभ
यूनियन के महामंत्री अमला यादव के मुताबिक, पिछला कार्य बहिष्कार और आंदोलन जनवरी 2026 में हुआ था। उस समय एसडीएम निचलौल, मजदूर यूनियन और मिल प्रबंधन के बीच त्रिपक्षीय समझौता हुआ कि नियमित भुगतान के साथ पुराना बकाया भी किस्तों में दिया जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मामले में श्रम प्रवर्तन अधिकारी की तरफ से मिल प्रबंधन को नोटिस जारी हुआ लेकिन पहली नोटिस में मिल से कोई नहीं आया। यूनियन ने चेतावनी दी है कि अगर इस बार बकाया भुगतान नहीं हुआ तो पेराई सत्र शुरू नहीं होने दिया जाएगा।

10 रुपये के स्टांप पर मिल ने ली क्षेत्रीय किसानों से जमीन
मिल कर्मियों के मुताबिक 10 रुपये के इकरारनामे के आधार पर गड़ौरा व निचलौल के किसानों की चार डिस्मिल से लेकर 54 डिस्मिल जमीन नौकरी देने के नाम पर ली। दस्तावेज में साफ लिखा है कि किससे कितनी जमीन ली जा रही और इस एवज में उन्हें मिल में किस पद पर रखा जा रहा है। निचलौल के ग्राम पंचायत गड़ौरा निवासी राजू के परिवार से 1994 में 54 डिस्मिल जमीन लेकर उन्हें परमानेंट प्लंबर की नौकरी देने का इकरारनामा किया गया। शर्तों के आधार पर उन्हें 1997 से परमानेंट प्लंबर पद पर नौकरी भी दी गई, लेकिन 2012 के बाद से उन्हें कोई भुगतान नहीं मिला। उनका करीब 17 लाख रुपये वेतन, ग्रेच्युटी और ईपीएफ का बकाया है। ऐसे लोगों की फेहरिस्त गड़ौरा चीनी मिल में लंबी है।

बोले लोग-
मेरे पिता जी ने मिल को 54 डिस्मिल जमीन दी थी, तब मुझे प्लंबर की परमानेंट नौकरी मिली। हमारी जमीन पर गड़ौरा मिल का कांटा लगा है। 1997 से 2012 तक सभी वेतन भत्ते व ग्रेच्युटी मिली लेकिन 2012 से एक रुपया नहीं मिला।
- राजू, पीड़ित कर्मी, निवासी गड़ौरा ग्राम पंचायत
बॉयलर इंचार्ज के पद पर ईमानदारी से काम किया। 2012 के बाद से वेतन और ईपीएफ दोनों बंद है। प्रबंधन सिर्फ तारीख देता है। बच्चों की पढ़ाई तक मुश्किल हो गई है। श्रम कानून की नुमाइंदगी करने वाले गड़ौरा चीनी मिल प्रकरण में मौन हैं।
- सिपाही यादव, बॉयलर व पीड़ित मिल कर्मी, निवासी, हाटा, कुशीनगर।
गड़ौरा चीनी मिल में नौकरी के लिए स्थानीय लोगों ने जमीन दी, लेकिन हम जैसे प्रशिक्षित ट्रेडों का प्रशिक्षण पाने वालों ने योग्यता लगाई। मैं 22 नवंबर 2006 से जुलाई 2026 तक मिल में इलेक्ट्रीशियन तैनात रहा। सेवानिवृत्त होने के बाद दो माह बीत गया, लेकिन मुझे भुगतान नहीं किया गया।
- अशोक श्रीवास्तव, मिल इलेक्ट्रीशियन, बस्ती
मैं गड़ौरा चीनी मिल में बतौर फिटर परमानेंट कार्यरत रहा लेकिन उन्हें अचानक पिछले वर्ष परमानेंट श्रेणी से हटाकर डेली वेज कर दिया गया। मुख्यमंत्री पोर्टल पर तब से कई बार शिकायत कर चुका। हर बार मिल प्रबंधन गुमराह करती रिपोर्ट लगा देता है।
- गंगा मद्धेशिया, फिटर, गड़ौरा


बोले अधिकारी-मिल प्रबंधन की तरफ से श्रम कानून उल्लंघन के मामलों में विभाग ने कार्रवाई क्यों नहीं की यह जानकारी नहीं है। मेरे पास पहली बार प्रकरण इसी माह यूनियन से लाया गया। श्रम कानूनों के उल्लंघन की नोटिस जारी हो चुकी है। अगर तय समय तक मिल का पक्ष नहीं मिलता तो प्राथमिकी श्रम कानूनों के तहत दर्ज कराई जाएगी।
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- गणेश सिंह, श्रम प्रवर्तन अधिकारी
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