महराजगंज। सीमावर्ती क्षेत्रों में ब्रांडेड के नाम पर करोड़ों की नकली दवाएं हर माह खपत हो रही हैं। खास बात यह है कि तस्कर इसका फायदा उठा रहे हैं। नकली और असली में फर्क करना भी सामान्य ग्राहक के बस की बात नहीं है। नकली दवा के धंधे का जाल शहर से गांवों तक फैला है। हर महीने एक करोड़ रुपये की नकली दवाएं बिहार और नेपाल भेजी जा रही हैं।
गाजियाबाद में नकली दवाओं की बड़ी खेप पकड़े जाने के बाद यह मामला सुर्खियों में आ गया है। नेपाल के सीमावर्ती इलाकों से लेकर बिहार तक तस्कर दवाएं भेजकर मोटा मुनाफा कमा रहे हैं। ब्रांडेड दवा के नाम से मिलती जुलती ये दवाएं सस्ते दाम पर बेच दी जाती हैं। ब्रांडेड दवाएं जहां 100 रुपये पत्ता मिलती हैं तो नकली 40 से 50 रुपये में उपलब्ध हो जाती हैं। इनमें ज्यादातर कैंसर की दवाएं होती हैं। इसके अलावा गर्भपात, फेफड़े सहित विभिन्न तरह से संक्रमण, गठिया, रोग प्रतिरोधक क्षमता से जुड़ी दवाएं भी शामिल हैं।
सूत्र बताते हैं कि एक माह में करीब एक करोड़ की दवा नेपाल के सीमावर्ती इलाकों में खपत हो रही है। दवा कंपनी में काम कर रहे जितेंद्र कहते हैं कि बीमारी में आराम न होने पर लोग मानते हैं कि दवाओं का असर कम हो रहा है। ब्रांड नेम से मिलती जुलती दवा बाजार में सामान्य व्यक्ति नहीं पहचान पाएगा। रेट में अंतर होने के चलते इसकी खूब बिक्री होती है। इन दवाओं का असर ज्यादा नहीं होता है।
सूत्रों की माने तो असली-नकली के खेल में असल मामला साल्ट का है। दवाओं का साल्ट महंगा नहीं होता, बल्कि उसकी टेस्टिंग, प्रचार, परिवहन और टैक्स आदि के चलते ब्रांडेड कंपनी का रेट बढ़ जाता है। उसी साल्ट और ब्रांडेड कंपनी के नाम पर बनाई गई दवा पर न तो किसी प्रकार का टैक्स देना होता है और न ही कोई अन्य खर्च। इससे दुकानदार को भी 50 प्रतिशत से ज्यादा मुनाफा मिलता है।
सीमावर्ती इलाके में सीरप का बड़े पैमाने पर उपयोग हो रहा
सूत्रों की माने तो दवाओं के इस खेल के साथ बड़े पैमाने पर कोडिनयुक्त कफ सीरप का भी खेल चल रहा है। इस साल्ट वाली कफ सीरप को बच्चों के लिए खतरनाक बताया गया है। इसमें अफीम का प्रयोग होता है, इसलिए इसका प्रयोग लोग नशे के लिए करते हैं। बताया जाता है कि बिहार और नेपाल के सीमावर्ती इलाके में बड़े पैमाने पर उपयोग हो रहा है। बिहार में शराबबंदी के चलते भी इसका प्रगोग बढ़ा है। इसे पीने वालों के मुंह से शराब की दुर्गंध नहीं आती, इसलिए भी इसकी मांग अधिक है। नेपाल सीमा क्षेत्र में इसकी खपत अधिक है। पिछले साल महराजगंज में करीब 700 करोड़ की जो दवाएं पकड़ी गई थीं, उसमें इसी प्रकार के सीरप और टेबलेट थे। उधर, विभाग के अधिकारियों की नजर ऐसी दवाएं नहीं बिक रहीं हैं।
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समय-समय पर जांच की जाती है। जिले में ऐसा मामला कभी सामने नहीं आया है। दवाओं के नमूने भी ज्यादातर पास हो जाते हैं। अगर ऐसी शिकायत मिलती है तो जांच के बाद कार्रवाई की जाएगी।
-शिव कुमार नायक, औषधि निरीक्षक