सोहगीबरवां सेंचुरी में इको सेंसिटिव जोन का दायरा घटा
अब 10 किमी के बजाय एक किमी. हुई इको जोन की परिधि
जंगल के आसपास बसे किसानों व कारोबारियों की सहूलियत बढ़ेगी
अमर उजाला ब्यूरो
महराजगंज। सोहगीबरवां वन्य जीव सेंचुरी में इको सेंसिटिव जोन का दायरा 10 किलोमीटर से घटाकर एक किलोमीटर कर दिया है। इससे जहां सेंचुरी के नजदीकी क्षेत्र के किसानों, कारोबारियों को काम के विस्तार में सहूलियत हो सकेगी, वहीं वन्य जीवों की आजादी और सुरक्षा को चुनौती पेश आने के सवाल भी उठने लगे हैं।
सोहगीबरवां के प्रभागीय वनाधिकारी मनीष सिंह ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2002 में सभी राज्यों को निर्देशित किया था कि जब तक सरकार संरक्षित क्षेत्रों की इको सेंसिटिव जोन की सीमा तय नहीं करती है, तब तक यह सीमा दस किमी रहेगी। इस बीच केंद्र सरकार ने इको सेंसिटिव जोन की सीमा एक किमी निर्धारित कर दी है। इसके लिए 29 नवंबर 2017 को गजट जारी हो गया है।
ऐसे में नजदीकी क्षेत्र के ग्रामीणों और कारोबारियों को अब नौ किलोमीटर की परिधि में पेड़ काटने की अनुमति से लेकर इंडस्ट्री, कुटीर उद्योग शुरू करने, विस्तार देने, खेती-बागवानी के लिए वन विभाग की एनओसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। जाहिर है कि इससे नजदीकी लोगों को कामकाज में सहूलियत होगी। जरूरत पर लाउडस्पीकर का प्रयोग भी कर सकेंगे।
नए बदलाव से सेंचुरी के वन्य जीवों के मात्र एक किलोमीटर की परिधि में सिमट जाने के सवाल पर डीएफओ मनीष सिंह ने कहा कि इससे वन्य जीवों की गतिशीलता, रिहाइश, प्रजनन आदि पर खास असर नहीं होगा। उनके लिए वन का पूरा दायरा मिलेगा। अभी भी भटक कर आबादी तक आने वाले जीवों को सुरक्षित जंगल में छुड़वा दिया जाता है।
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बाघ, तेंदुआ, जंगली बिल्ली, नीलगाय, सुअर, नेवला, लोमड़ी, सियार, सांभर, हिरण का ठिकाना है सोहगीबरवां सेंचुरी में।
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बढ़ सकता है अवैध खनन का खतरा
इको सेंसिटिव जोन का दायरा एक किमी सीमित होने का मामला
अमर उजाला ब्यूरो
महराजगंज। सोहगीबरवां सेंचुरी की 10 किलोमीटर परिधि इको सेंसिटिव जोन निर्धारित होने से इस क्षेत्र में पेड़ काटने से लेकर आरा मशीनों की स्थापना, ध्वनि प्रदूषण करने वाले उद्योग, जलौनी लकड़ी के वाणिज्यिक उपयोग, ईंट-भट्ठों की स्थापना, खनन, पत्थर की खदान, पत्थर तोड़ने, प्लास्टिक बैग व लाउडस्पीकर के उपयोग को प्रतिबंधित किया गया था। अब यह दायरा एक किलोमीटर तक सीमित हो जाने से इलाके में इन कामों की छूट के साथ-साथ अवैध खनन बढ़ने का खतरा जताया जाने लगा है।
सेंचुरी के करीबी इलाकों में रहने वालों का कहना है कि मिट्टी की खदान से लेकर बालू के खनन तक के काम में जिस रफ्तार से माफिया का दखल बढ़ा है, उसे इस इलाके में काबू रखने में इको सेंसिटिव जोन की पाबंदी का बड़ा योगदान रहता था। हालांकि यूपी में सत्ता संभालने के बाद सीएम आदित्यनाथ ने अवैध खनन को लेकर सख्ती बढ़ाई है लेकिन इस बीच वन क्षेत्र से जुड़े नियमों का बदलाव लेकर चालाक लोग दबे पांव अवैध खनन की कोशिश कर सकते हैं। इस अवैध खनन से वन्य जीवों को पर्यावरण के अनुकूल माहौल न मिलने की समस्या के साथ-साथ पेड़ों के गिरने और बाढ़ आने के खतरे भी बढ़ते हैं।
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