उदितपुर के जांबाजों ने पाक को दिया था मुंहतोड़ जबाब
सैनिक गांव की माताएं बच्चों को देश भक्ति की पाठ पढ़ाती हैं
छह सैनिकों ने कारगिल युद्ध में हिस्सा लेकर गांव का मान बढ़ाया था
प्रदीप अग्रहरी
फरेंदा। कारगिल युद्ध हो या कोई और। अधिकांश में फरेंदा क्षेत्र के सैनिक गांव उदितपुर के जांबाज सैनिकों की भूमिका अहम रही है। कारगिल युद्ध में सैनिक गांव के छह रणबांकुरों ने पाकिस्तानी सेना के छक्के छुड़ा कर भारत की जमीन पर कब्जा करने के पाक के नापाक इरादे को ध्वस्त कर दिया था। वह रणबांकुरे आज भी देश की सीमा की निगहबानी कर रहे हैं।
फरेंदा क्षेत्र का सैनिक गांव उदितपुर के सोनू गुरूंग, मोहित गुरूंग, संदीप गुरूंग, कमल गुरूंग, आनंद गुरूंग व सत्यम थापा अपने पूर्वजों से सीख व देश सेवा का व्रत लेकर 1998-99 में सेना में भर्ती हुए थे। भर्ती होने के अगले वर्ष ही कारगिल युद्ध की शुरूआत हो गई। सैनिक गांव के इन जांबाज सैनिकों की तैनाती कारगिल में ही रही। भारत को विजय दिलाने में इनकी भी भूमिका महत्वपूर्ण रही। कारगिल युद्ध के दौरान सैनिक गांव में अनेक युवा सेना में भर्ती हुए। उस दौरान भर्ती हुए आनंद गुरूंग, सत्यम, सोनू गुरूंग, कमल गुरूंग, मोहित गुरूंग तथा संदीप विभिन्न सीमाओं पर देश की रक्षा के लिए समर्पित हैं। गांव के जांबाज युवा आज भी देश की सेवा के लिए अपनी जान की बाजी लगाने को तैयार रहते हैं।
गांव के मुखिया मेजर एसबी गुरूंग ने बताया कि देश में जितने भी युद्ध हुए सबमें फरेंदा के सैनिक गांव का विशेष योगदान रहा। वह चाहे भारत-पाकिस्तान, भारत-चीन अथवा दितीय विश्व युुद्ध ही क्यों न हो। सभी में इस गांव के जांबाजों ने दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए थे। श्रीलंका में गए शांति सेना में भी इस गांव की भागीदारी रही। गांव के रामू गुरूंग ने श्रीलंका में अपने दोनो पैर गवां दिए थे। गांव में 500 सैनिक परिवार रहते हैं। प्रत्येक घर से कम से कम एक सैनिक देश की सेवा में समर्पित है। आज भी देश के सेवा के लिए लद्दाख, कारगिल, काश्मीर आदि जगहों पर रह कर देश की सीमा की रखवाली कर रहे हैं।