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युवाओं का हो रहा खेती से मोहभंग, कर्ज को लेकर परेशान

Fri, 06 Mar 2020 11:51 AM IST
झांसी ब्यूरो अमर उजाला नेटवर्क, ललितपुर
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फूलों की खेती - फोटो : अमर उजाला
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पुरानी कहावत है किसान कर्ज में जन्म लेता है, कर्ज में पूरा जीवन बिताता है और कर्ज में ही मर जाता है। यह आज भी सही है। यही कारण है कि युवाओं का खेती-किसानी से मोहभंग हो रहा है।
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नौजवान पीढ़ी गांव में नहीं रहना चाहती है। यदि युवा खेती नहीं करेंगे तो भविष्य के किसान कहां से आएंगे। वहीं, युवाओं का मानना है कि किसानों को फसलों का समुचित मूल्य नहीं मिल पाता है। जितनी भी सरकारें आई गईं, उनमें ज्यादातर ने किसानों को राजनीति का जरिया बनाकर सियासत चमकाने में ही दिलचस्पी ली। किसान को लेकर राजनीति होती रही, लेकिन किसानों को लेकर कोई कारगर नीति अभी तक नहीं बनी है। किसानों के हित और आर्थिक तरक्की के लिए व्यवहारिकता के धरातल पर जितना काम होना चाहिए था, वह नहीं हुआ। इसलिए किसान बदहाल हैं। बुंदेलखंड की खेती घाटे का सौदा है, इस कारण युवाओं का इस ओर रुझान नहीं है।

कृषि कार्यों में युवाओं की भागीदारी काफी अहम है। लेकिन, कृषि योग्य भूमि के आकार में गिरावट, तकनीकी ज्ञान के अभाव, वित्त की सहज उपलब्धता नहीं होने, कृषि उत्पादों के लिए कारगर मार्केटिंग सुविधा का अभाव होने, नीतिगत मामलों में युवाओं की सीमित भागीदारी होने और व्यवसाय के तौर पर खेती की खराब छवि होने से ग्रामीण युवाओं का तेजी से खेती से मोहभंग हो रहा है। यदि इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में कृषि पर और संकट आने से इंकार नहीं किया जा सकता है।
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युवाओं की रुचि पर दिया था जोर
कृषि क्षेत्र में युवाओं द्वारा दिलचस्पी कम लेने पर चिंता जताते हुए मशहूर कृषि विशेषज्ञ एमएस स्वामीनाथन की अगुआई वाले राष्ट्रीय किसान आयोग ने वर्ष 2006 में अपनी रिपोर्ट में कृषि क्षेत्र में युवाओं की रुचि बनाई रखने की जरूरत पर जोर दिया था। लेकिन, अभी तक इस दिशा में प्रभावी कदम नहीं उठाए गए हैं।

किसान केवल राजनीतिक मोहरा बनकर रह गया है। राजनीतिक पार्टियां किसानों को राजनीति का जरिया बनाकर सियासत चमकाने में ही रहती हैं। किसानों के लिए कोई भी कारगर नीति नहीं बनाता है, इस वजह से दिन प्रतिदिन खेती घाटे का सौदा साबित हो रही है। इस वजह से युवा किसानी से इतर रोजगार के अन्य विकल्प तलाश रहा है।
- देवेंद्र प्रताप सिंह

किसान तन, मन व धन लगाकर खेती करता है, फसल काटकर जब उसे बेचने जाता है तो उसे उचित मूल्य नहीं मिलता है। मक्का, गेहूं, जौ आदि हमारे इलाके में उपजता है, परंतु उससे बिस्कुट दिल्ली, कोलकता आदि शहरों में बनकर हमारे बाजारों में बिकता है। कृषि उत्पादन से इस पर आधारित उद्योगों की मांग तो पूरी हो जाती है, परंतु किसानों को उचित हक नहीं मिलता है। इससे कंपनियां मालामाल और किसान बेहाल हैं।
- निर्बल सिंह

बिना कृषि के मानव जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। घाटे के बावजूद किसान खेती से मुंह नहीं मोड़ पा रहे हैं। युवा वर्ग इसलिए खेती से नहीं जुड़ पाता है, क्योंकि उनकी भी कुछ आकांक्षाएं होती हैं। वे बेहतर तरिके से जीना चाहते हैं, इसलिए गावं से पलायन कर जाते हैं। युवाओं का पलायन कृषि के जरिए रोका जा सकता है, इसके लिए उसे बेहतर आर्थिक अवसर प्रदान करने चाहिए, जिससे उसका जुडाव कृषि की ओर हो सके।
- पंचम सिंह

कृषि घाटे का सौदा बना हुआ है। क्योंकि जहां एक श्रमिक की आवश्यकता है, वहां पूरा परिवार लगा रहता है। बुवाई के मौसम में खाद-बीज आदि का मूल्य बढ़ जाता है, पर जब कृषि उत्पाद बाजार में आता है तो उसका भाव गिर जाता है। इस वजह से युवा कृषि को पेशे के रूप में नहीं अपना रहा है।
- गोलू रिछारिया

वैज्ञानिक पद्धति से कॉलेज स्तर पर प्रशिक्षण दिया जाए, कुटीर एवं कृषि आधारित घरेलू उद्योगों को बढ़ावा दिया जाए। इसके बाद ही भारतीय किसान मुनाफा कामाएंगे और पैसे की चाहत में युवा वर्ग भी खेती की ओर रुख करेंगे।
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- डा. जनक किशोरी शर्मा, शिक्षाविद
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