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Lalitpur News: अपनी परवाह न कर हर गोली का दिया जवाब, कारगिल पर फहराया तिरंगा

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ललितपुर। देश की सीमाओं के सजग प्रहरियों को वर्ष 1999 में जब कारगिल युद्ध का सामना करना पड़ा तो उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बगैर दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए थे। कारगिल युद्ध में दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब देने वालों में यहां के सैनिक भी शामिल थे। कारगिल विजय दिवस की पूर्व संध्या पर सेवानिवृत सैनिकों को एक बार फिर पुराने दिन याद आ गए। उन्होंने कहा कि रात में दुश्मनों की निगाह से बचते हुए गोला-बारूद मोर्चे पर डटे साथियों तक पहुंचाते थे। भारतीय फौज ने कारगिल युद्ध में दुश्मन को खदेड़कर विजय प्राप्त की। पेश है कारगिल युद्ध के दौरान मोर्चे पर डटे सैनिकों से बातचीत का अंश...।
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दुश्मनों की निगाह से बचने के लिए घायल साथी को कोहनी के बल कैंप तक लाए : कैप्टन अशोक सिंह
सेवानिवृत्त कैप्टन अशोक कुमार सिंह ने बताया कि वर्ष 1999 में वह 328 यूनिट फील्ड हॉस्पिटल एपीसी में नायक पद पर तैनात थे। कारगिल युद्ध के दौरान वह घायल जवानों को कैंप तक पहुंचा रहे थे। दुश्मनों की गोलियों से घायल भारतीय जवानों को लाने के लिए वह जमीन पर लेटकर ही मौके पर पहुंच पाते थे और घायल साथी को स्ट्रेचर पर लिटाकर कैंप में पहुंचाते थे। एक बार स्ट्रेचर खराब होने पर उन्होंने अपनी व साथी की राइफल की सीलिंग खोलकर स्ट्रेचर बनाया और उस पर घायल को लेकर जब चले तो दुश्मन की गोली से बचने के लिए करीब आधा किमी तक कोहनी के बल चलकर कैंप तक आए। प्राथमिक उपचार के बाद हेलीकॉप्टर से जवान को अस्पताल भेजा गया। उन्होंने बताया कि अपनी जान की परवाह न कर घायल साथी को बचाने की कोशिश रहती थी। परिवार से संपर्क का माध्यम मोबाइल नहीं पत्र ही रहता था। युद्ध के दौरान परिवार के लोग परेशान थे, लेकिन ईश्वर ने मदद की और कारगिल फतह का सपना साकार हुआ।
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गोला-बारूद ले जाने के दौरान साथी हवलदार को लगी थी गोली
सेवानिवृत्त नायक लोकेंद्र शर्मा ने बताया कि वह 5031 एएससी (आर्मी सर्विस कोर) बटालियन श्रीनगर जम्मू कश्मीर में तैनात रहे। वह कारगिल युद्ध में मोर्चे पर डटे जवानों के लिए राशन, गोला-बारूद और अन्य आवश्यक सामग्री पहुंचाते थे। पहाड़ी पर बनी सड़क पर जाने का जोखिम होने पर रात के अंधेरे में नीचे के रास्ते से किसी तरह मोर्चे पर मौजूद साथियों तक पहुंचते थे। इस दौरान दुश्मन की गोलियों से भी बचाव करना पड़ता था। एक रात वह हवलदार धीरेंद्र सिंह के साथ गोला- बारूद लेकर मोर्चे की ओर जा रहे थे तभी दुश्मन ने फायर कर दिया। गोली हवलदार धीरेंद्र सिंह को लगी, वह लहूलुहान होकर गिर गए। टीम उन्हें कैंप में ले गई, जहां से उन्हें अस्पताल भेजा गया। 0000000
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बर्फीली पहाड़ी से दुश्मनों की हर गोली का देते थे जवाब
सेवानिवृत्त नायब सूबेदार वीरेंद्र सिंह ने बताया कि वह कुमायूं रेजिमेंट में तैनात थे। कारगिल युद्ध के दौरान वह अपने साथियों के साथ बर्फीली पहाड़ी पर मोर्चा जमाए थे और दुश्मनों की हर गोली का जवाब दिया। बर्फीली पहाड़ी पर सर्दी होने के बाद भी हौसला डिगा नहीं। उस समय देशवासी सेना का मनोबल बढ़ा रहे थे। हमें फख्र है कि भारतीय सेना ने दुश्मनों को खदेड़ कर कारगिल पर तिरंगा फहराकर भारत का मस्तक ऊंचा किया। कारगिल विजय दिवस पर अपने सभी जवान साथियों व देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं। नायब सूबेदार वर्तमान में जिला सैनिक कल्याण एवं पुनर्वास की जिम्मेदारी संभाले हैं।
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