ललितपुर। लॉकडाउन के पहले शहर के विभिन्न मोहल्लों में मशीनों की खटपट की आवाज सुनाई देती थी, साड़ी के बुनकरों को काम मिलता था। लेकिन, मौजूदा समय में इन मोहल्लों में अजीब सा सन्नाटा है। कारीगरों के चेहरों पर मायूसी है। अब उन्हें लॉकडाउन खुलने का इंतजार है, जिससे कि जिंदगी पटरी पर आ सके।
कोरोना वायरस से फैल रही महामारी ने लोगों की जिंदगी में ठहराव ला दिया है। लॉकडाउन में जनपद की सीमाएं सील कर दी गई हैं। इससे सीमावर्ती जिलों से जनपदवासियों का संपर्क कट गया है। इसमें चंदेरी साड़ी बनाने के काम में लगे एक सैकड़ा कारीगर बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। सिविल लाइन की वसुंधरा कॉलोनी व गांधीनगर नई बस्ती में साड़ी बनाने वाले अधिकांशत: कारीगर रहते हैं। जब से राजघाट-चंदेरी की सीमाएं सील हुई हैं, तब से कारीगरों का रोजगार छिन गया है, साथ ही उनकी मशीन भी बंद हो गई हैं। वर्तमान में कारीगरों को तंगहाली का जीवन गुजारना पड़ रहा है। इस मुश्किल समय में न तो श्रम विभाग से उन्हें कोई राहत मिली है और न ही नगर पालिका से। उद्योग विभाग कारीगरों को आउटसोर्सिग कर्मी बताकर पल्ला झाड़ता नजर आ रहा है। इस तरह कारीगरों को राहत मिलती नहीं दिख रही है। इस समय साड़ी के बुनकर आदर्श पंथी, दुर्गाप्रसाद पंथ, जगदीश पंथ, दरऊ, हरीशंकर, भागीरथ, रमेश व रामसिंह बेहद परेशान हैं, उनकी पीड़ा सुनने के लिए अभी तक कोई नहीं पहुंचा है।
ऐसे करते हैं कारीगर काम
चंदेरी साड़ी के कारोबारी कारीगरों को धागा उपलब्ध कराते हैं। उन्हें साड़ी बनाने के लिए समय निर्धारित किया जाता है। इसके अनुसार ही एक साड़ी का मेहनताना तय होता है।
चंदेरी साड़ी बनाने का काम करते हैं। बीस दिन में एक साड़ी तैयार हो पाती है। इसमें दो सौ रुपये दिन मजदूरी पर काम करते थे। वर्तमान में घर में कैद होकर रह गए हैं। रोजगार छिनने से परिवार के नौ सदस्यों के साथ गुजर- बसर करना मुश्किल हो रहा है।
- कमलदास
साड़ी बनाने का काम ठेका पर करते थे। इस तरह वह आठ दिन में साड़ी तैयार कर लेते थे, जिससे करीब तीस हजार रुपये कमाते थे। लॉकडाउन में रोजगार तो छिन ही गया है। न तो श्रम विभाग और न ही नगर पालिका ने उन्हें कोई मदद दी है।
- अमनपंथी
चंदेरी साड़ी बीस दिन में तैयार कर पाते थे। यदि लॉकडाउन नहीं होता तो अभी तक करीब आठ हजार रुपये कमा लेते। लॉकडाउन में सरकार ने कारीगर एवं मजदूर वर्ग के लिए कई घोषणाएं कीं, लेकिन उन्हें इनमें से किसी योजना का लाभ नहीं मिल सका है।
- दिनेश कुमार
चंदेरी साड़ी बनाकर आठ से दस हजार रुपये महीने में कमा लेते हैं, लेकिन दो महीने से कोई काम नहीं है। तंगहाली में परिवार के तीन सदस्यों का खर्चा उठाना मुश्किल हो गया है। सुना है कि नगर पालिका व श्रम विभाग एक हजार रुपये की सहायता प्रदान कर रहा है, लेकिन उसे न तो आर्थिक सहायता और न ही राशन की किट मिल पाई है।
- महेंद्र
एक जिला एक उत्पाद योजना के अंतर्गत जिले में जरी साड़ी सिल्क चयनित की गई है, इसमें कई कारीगर काम करते हैं। इन कारीगरों को बैंक से ऋण मुहैया कराया जाता है। उन्हें 25 प्रतिशत अनुदान भी मिलता है। चंदेरा में उद्योग को चलाने की अनुमति प्रदान की गई है। धीरे-धीरे अन्य उद्योग भी संचालित होने की उम्मीद है। जिससे कारीगरों को दोबारा रोजगार उपलब्ध होने लगेगा।
- एसके सूर्यवंशी, महाप्रबंधक, उद्योग केंद्र
साड़ी बनाने की मशीन- फोटो : LALITPUR