बुंदेलखंड पैकेज के तहत करीब 70 करोड़ रुपये की लागत से तैयार की जा रही जखौरा बिजरौठा ग्राम समूह पेयजल योजना की जांच करने के लिए आई प्रदेश स्तरीय टीम भौतिक स्थलीय व संबंधित कागजों की जांच करके वापस चली गई है।
इस संबंध में जांच टीम के अधिकारी आरआर सिंह अधिशासी अभियंता लखनऊ ने बताया कि योजना संबंधी तो शिकायतें की गई थी, वह काफी हद तक सही पाई गई है। इसके अलावा स्थानीय जल निगम कार्यालय में काफी अनियमितताएं है जो जांच के दौरान सामने आई हैं। बिना कार्यों के फर्जी तरीके से भुगतान कर देना, धरातल पर कम और कागजों पर अधिक कार्ययोजना यह अनियमितताएं सामने आई हैं। इसके अलावा कुछ हैंडपंपों की भी जांच की है, जिसमें भी गड़बड़ी पाई गई है। हैंडपंपों के बोर की गहराई कम है और इसमें पाइपों की भी चोरी सामने आई हैं। इन कार्यों में अधिकारियों की संलिप्तता को झुठलाया नहीं जा सकता है। उन्होंने बताया कि सभी जांच बिंदू व साक्ष एकत्रित कर लिए हैं, जिन्हें प्रदेश स्तरीय अधिकारियों के समक्ष पेश किया जाएगा। जांच टीम में लखनऊ के सहायक अभियंता सूर्यवली आनंद और अवर अभियंता मो. खालिद शामिल थे। टीम अपनी जांच करके शुक्रवार की दोपहर करीब दो बजे जनपद से रवाना हो गई थी।
यह है मामला
बुंदेलखंड पैकेज के तहत केंद्री सरकार ने विगत वर्ष 2014-15 में करीब 70 करोड़ रुपये की लागत से जखौरा बिजरौठा पेयजल योजना की स्वीकृति दी थी। इसका तैयार करने की जिम्मेदारी जल निगम विभाग को सौंपी गई थी। जल निगम की टैक्नीकल इकाई में इस कार्य योजना के स्टीमेट की दरों के लेकर तत्कालीन अधिशासी अभियंता एसपी सिंह व सहायक अभियंता बीडी साहू के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा था। यह विवाद बीते 18 अप्रैल को खुल कर सामने आ गया था और दोनों के बीच मारपीट तक हो गई थी और दोनों के खिलाफ मुकदमें बाजी भी हुई है। जब घटना की जानकारी विभाग के प्रदेश मुख्यालय पहुंची, तो इसके बाद जांच बैठाई गई थी। गौरतलब है कि इस योजना में शुरुआत से अनियमितता रही है। पंप प्लांट का पहली बार टेंडर 3.32 करोड़ का हुआ था, इसके बाद शिकायतें होने के बाद जब दोबार टेंडर क्रिया गया तो उन्हीं कार्यों का टेंडर मात्र 1.80 करोड़ में हुआ। इसी तरह कुछ कार्यों के टेंडर भी चोरी-छिपे लगाए गए थे।
बिना शासन की मंजूरी के कई बार कार्ययोजना के स्टीमेट में भी फेरबदल किया गया। सब स्टेशन बनने से पहले ही करीब 50 लाख रुपए की लागत से स्टेब्लाइजर खरीद लिए गए और भुगतान भी कर दिया गया, जबकि नियमानुसार जहां पर विद्युत सब स्टेशन बनाया जाता है वहां पर स्टेब्लाइजर की आवश्यकता नहीं होती है। यदि जांच टीमों ने उक्त बिंदुओं पर बारीकी से जांच की है तो फिर विभाग के कई अधिकारियों का निपटना तह है। इसके अलावा आने वाले दिनों में जल निगम के विभिन्न कार्यों पर भी जल्द जांच बैठना भी तय ही मानिए।