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सूखे ने पहुंचाया 30 साल पुराने हालात में

Mon, 18 Apr 2016 01:27 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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water crisis, lalitpur news - फोटो : demo
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कपिल नायक
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ललितपुर। बुंदेलखंड में इस बार सूखे की मार बहुत जबरदस्त पड़ रही है। इसका अंदाजा गांवों में 30 साल पहले इस्तेमाल में आने वाले कम सिंचाई से उत्पादित अनाज का सेवन किए जाने से लगाया जा सकता है। हालात यह है कि पिछले साल हुई ओलावृष्टि, अतिवृष्टि और इस वर्ष पड़े सूखे के कारण

ग्रामीण अब कोदों, रोली और कुटकी जैैसे मोटे अनाजों की रोटी खा रहे हैं। इन मोटे अनाजों का कम सिंचाई में भी उत्पादन हो जाता है।
बुंदेलखंड में ललितपुर जिले की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यह अक्सर सूखे की चपेट में रहता है। सूखा इलाका होने के कारण वर्षों पहले जिले में गेहूं व चने की जगह कोदों, फिकार, रोली,  कुटकी, जौ जैसे अनाज पैदा होते थे। बुजुर्गों की मानें तो चून (गेहूं) की रोटी केवल मेहमानों के लिए ही बनती थी, लेकिन पिछले करीब 30 साल से मोटे अनाज का चलन बंद हो गया था और ज्यादातर लोग गेहूं का उपयोग करने लगे थे। प्रकृति की मार ने जनपद के सूखा पीड़ित ग्रामीणों को फिर से तीस साल पहले के हालातों में धकेल दिया है।
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 देश की आजादी के बाद लोकतंत्र का पहला पर्व मनाने में शरीक रहने वाली सुुहाग रानी (95 वर्ष) ने बताया कि वे वर्षों पहले कोदों, फिकार, रोली जैसे मोटे अनाज का सेवन करते थे। सूखे ने उनको एक बार फिर इन मोटे अनाजों की रोटी खाने के लिए मजबूर कर दिया है। उन्होंने इस बात पर सख्त एतराज जताया कि कुछ लोग इसे घास की रोटी कहते हैं। उनके अनुसार ये मोटा अनाज हैं और कम सिंचाई में भी इनका उत्पादन हो जाता है। जनपद के कई इलाकों में जहां सूखे के कारण ग्रामीणों के पास गेहूं, चना जैसे अनाज खरीदने की स्थिति नहीं बची है, वे इनका इस्तेमाल करते हैं। ग्राम लड़वारी में ही कई घरों में केवल कोदों की रोटी व बथुआ की भाजी से काम चलाया जा रहा है।

ग्राम लड़वारी में खाई जाने वाली ये रोटी 30 साल पुरानी स्थिति के लौटने को बयां कर रही है। 30 साल पहले जनपद में पानी की कमी के कारण कोदों, फिकार, रोली व कुटकी जैसे अनाज पैदा होते थे और यहां के लोग इन्हीं अनाजों के सहारे अपना जीवन यापन करते थे। पिछले कुछ सालों में जनपद में कई बांध बन जाने से यहां सिंचाई के साधन उपलब्ध हो गए और गेहूं व चना जैसी फसलें पैदा होने लगीं, लेकिन अब सूखे के कारण जनपद के कई इलाकों में लोगों को फिर पुराने मोटे अनाज पर ही निर्भर होना पड़ा है। ग्रामीणों का कहना है कि यह अनाज भले ही घास की श्रेणी में रखे जा रहे हो, लेकिन पेट की आग बुझा रहे हैं। ग्रामीणों ने बताया सूखे के इन अनाजों की एक गुणवत्ता है, कि कोदों, फिकार, रोली व कुटकी वर्षों रखने के बाद भी ख्रराब नहीं होते और कभी भी खाने के काम में आ जाते हैं।
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सीएम साहब बच्चों को बुला दो
19 अप्रैल को ग्राम लड़वारी का दौरा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को करना है। मुख्यमंत्री के दौरे को लेकर तैयारियां चल रही हैं। पूरे प्रशासन ने लड़वारी   गांव में डेरा डाल लिया है। लड़वारी गांव में दलितों की दो बस्ती हैं। एक बस्ती में सहारिया तो दूसरी बस्ती में अहिरवार जाति के लोग निवास करते हैं।  दोनों बस्तियों में केवल बुजुर्ग, बच्चे व महिलाएं ही बचीं है, जबकि  जवान लोग मजदूरी करने के लिए इंदौर, भोपाल जैसे महानगरों में पलायन कर गए  हैं। गांव की चौपालों पर केवल बुजुर्ग समय गुजारते दिख जाते हैं। ऐसे ही एक छक्की लाल सहारिया बताते हैं कि उनके तीन बेटे और बहुएं इंदौर मजदूरी करने गए हैं। गांव में कई घरों पर लटकते ताले पलायन की गवाही दे रहे हैं। मुख्यमंत्री के दौरे को लेकर छक्की लाल कहते हैं कि सीएम साहब कुछ  ऐसा कर दो कि बच्चे घर पर ही आ जाएं।
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