संवाद न्यूज एजेंसी
ललितपुर। बुंदेलखंड के लोग परंपराओं को जिंदा रखे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में होली दहन के दिन फगवारों की टोलियां ऐसे घरों में जाकर फाग गीत गाने के साथ रंग डालती है, जहां एक वर्ष के दौरान किसी व्यक्ति की मौत हुई होती है। शोक संतृप्त परिवार के लोगों पर रंग-गुलाल डालकर उन्हें अपनेपन का एहसास कराते हैं। जबकि, शोक संतृप्त परिवार इन फगवारों को गुड़ व बताशा खिलाते हैं। फगवारों की टोली में सभी वर्गों के लोग शामिल रहते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों के लोग आज भी होली पर परंपरा का निर्वहन करते हुए एकता की मिसाल पेश कर रहे हैं। आपस में कितने भी मतभेद क्यों न हों, होलिका दहन के दिन गांव के बुजुर्ग व युवाओं की टोलियां उन घरों में जाती हैं, जिन घरों में एक वर्ष के दौरान किसी व्यक्ति की मौत हुई रहती है। यहां फगवारे, कहां गए मित्र मिलनियां, हो राजा कहां गए मित्र मिलनियां, तुम सोच न करो, पार के लगईया परमात्मा, करमों के लिखे विधाता न मिटा पाए जैसे फाग गीत गाते हैं। फाग टोलियों का मार्ग दर्शन बुजुर्गों के हाथों में रहता है। बुजुर्ग बताते हैं कि जिस घर में एक वर्ष के दौरान मौत होती है, उस घर में अनरय की होली मानी जाती है। उक्त घर में गांव के लाेग फगवारे बनकर जाते हैं और उन्हें अपनेपन का एहसास दिलाते हुए उनके साथ होली मनाते हैं।
होली के बाद शोक संतृप्त घर में शुरू होते हैं शुभ कार्य
ग्रामीण क्षेत्रों में जिन घरों में एक साल में किसी व्यक्ति की मौत हो जाती है, वहां साल भर कोई त्योहार नहीं मनाया जाता। मान्यता है कि होली के त्योहार होने के बाद ही शोक संतृप्त घर में शुभ कार्य की शुरुआत होती है।
पांच दिन तक निकलती हैं टोलियां
गांवों में पांच दिनों तक फगवारों की टोलियां फाग गीतों के साथ घर-घर घूमती हैं। टोलियों के साथ गांव के लोग होते हैं। घरों में उनका आदर सम्मान किया जाता है। पांचवें दिन शाम को होलिका दहन स्थल पर टोलियां फाग कार्यक्रम का समापन कर देती हैं।