45 फीसदी दिव्यांग होने के बावजूद चित्रकला में हासिल की विशेष पहचान, कला को बनाया समाज सशक्तीकरण का माध्यम
संवाद न्यूज एजेंसी
ललितपुर। कहते हैं उड़ान पंखों से नहीं, हौसलों से होती है। इस कहावत को शहर की दिव्यांग शिक्षिका उर्वशी साहू ने सच कर दिखाया है। 45 फीसदी शारीरिक दिव्यांगता के बावजूद उन्होंने कला व समाजसेवा के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई। शारीरिक बाधाओं को ढाल बनाकर उन्होंने चित्रकला के माध्यम से समाज में प्रेरणा की नई मिसाल पेश की है।
शहर के मोहल्ला नदीपुरा रावतयाना, बड़ी देवी मंदिर के पास निवासी उर्वशी साहू ग्राम रघुनाथपुरा में शिक्षिका के पद पर कार्यरत हैं। वह डॉ. विकास गुप्ता जीत की पत्नी और डॉ. रमेश चंद्र साहू व ऊषा साहू की पुत्री हैं। शिक्षण कार्य के साथ ही वह साहूजी का बाड़ा में बच्चों को चित्रकला का प्रशिक्षण भी देती हैं। उर्वशी को चित्रकला के संस्कार अपनी मां से मिले। 45 फीसदी दिव्यांग होने के बावजूद वह एक हाथ के सहारे शानदार चित्र बनाती हैं और बच्चों को भी कला की बारीकियां सिखाती हैं। उनकी यह प्रतिभा और जज्बा दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।
दिव्यांगता के बावजूद उन्होंने शिक्षिका के दायित्वों के साथ चित्रकला के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। वह गेटेम्बे फाउंडेशन (मिशन बेटियां कला एवं संस्कृति) की जिला संयोजक हैं। इसके माध्यम से वह कला को बढ़ावा देने के साथ महिलाओं और युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ने का कार्य कर रही हैं। उन्होंने वर्ष 2018-19 में राज्य ललित कला अकादमी (उत्तर प्रदेश) में जिला संयोजिका के रूप में भी काम किया। अपनी संस्था ‘टू आर्ट क्रिएशन’ के माध्यम से वह देशभर में रोजगारपरक कला कार्यक्रम आयोजित कर लोगों को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित कर रही हैं। साथ ही हर वर्ष अप्रैल में निशुल्क आर्ट एंड क्राफ्ट शिविर का आयोजन कर नई पीढ़ी को कला से जोड़ने का प्रयास करती हैं।
बुंदेलखंड की पारंपरिक चितेरी बुंदेली लोक कला के संरक्षण और संवर्धन में भी उनका विशेष योगदान है। मिशन बेटियां के माध्यम से बेटियों के उत्थान और दिव्यांगजनों के सम्मान के लिए किया जा रहा उनका कार्य समाज के लिए प्रेरणादायक बन गया है।