ललितपुर। आईटीआई के पास रहने वाले प्रख्यात चित्रकार ओमप्रकाश बिरथरे ने शहर की 89 वर्ष पुरानी गंगा जमुनी तहजीब को चित्र में दर्शाया है। जनश्रुति के अनुसार तोपन का टीला स्थल पर चबूतरा के पास ही स्थित कुएं को हिंदू एवं मुसलमान समान रूप से दैनिक कार्यों के लिए उपयोग करते थे। आज भी वहीं शहर में भाईचारा कायम है।
शहर में हिंदु मुस्लिम के भाईचारा को कोई डिगा नहीं पाया है। देश में कितने भी हालात विस्फोटक बने लेकिन शहर गंगा जमुनी तहजीब पर कायम रहा। प्रख्यात चित्रकार ओमप्रकाश बिरथरे ने चित्र में इसे दर्शाने की कोशिश की है।
वह कई समसामायिक एवं धार्मिक, ऐतिहासिक स्थलों का चित्रण कर चुके हैं। कोरोना काल के समय का सदुपयोग करते हुए चित्र के माध्यम से तुवन मंदिर के इतिहास को दर्शाने की कोशिश की है। इसके लिए उन्होंने संतोष कुमार शर्मा द्वारा संपादित स्मारिका 98, नर्मदा प्रसाद वर्मा एवं अन्य बुजुर्गो से वार्ता की। इस दौरान जो तथ्य निकलकर आए, उन्हें ध्यान में रखकर सौ साल पुराने इतिहास को चित्रण किया है। चित्र में दर्शाया गया है कि वर्तमान में जिस क्षेत्र को तुवन के नाम से जाना जाता है, उसे 100 वर्ष पहले तोपन का टीला कहा जाता था। यहां पर अंग्रेजों की तोपे रखी जाती थीं। यहां इंडियन ब्रिटिश आर्मी की छावनी थी। यह मंदिर तोपों के कारण ही तुवन हनुमान जी के नाम से विख्यात हुआ। यहां चारों ओर घनघोर जंगल था। बताते हैं कि खबनापुल के नाले के पास से चमत्कारिक रूप से श्री हनुमान जी की मूर्ति मिली थी, जिसे पंडित रामप्रकाश एवं सेठ शिवराजदास माहेश्वरी ने अंग्रेज अफसरों की स्वीकृति से कच्चा चबूतरा बनाकर मड़िया में हनुमान जी महाराज को विधिवत प्राण प्रतिष्ठा करवाकर विराजमान करवाया था। सन् 1931 में श्री माहेश्वरी के अनुज द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी एवं पंडित पुरुषोत्तम नारायण चौबे एडवोकेट के प्रयासों से हनुमान जी महाराज की भव्य संगमरमर की मड़िया बनवाकर आगे विशाल चबूतरा बनवाया गया। जनश्रुति के अनुसार चबूतरा के पास ही स्थित कुएं को हिंदू एवं मुसलमान समान रूप से दैनिक कार्यों के लिए उपयोग करते थे। सौ साल पहले यह स्थान किस रूप में था, इसको चित्रित करने की बहुत इच्छा थी। पत्रिकाओं और बुजुर्गों से जानकारी ली गयी।
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प्रख्यात चित्रकार ओमप्रकाश बिरथरे ने बताया कि सौ साल पहले तुवन क्षेत्र कैसा था, इसे चित्रित करने का प्रयास किया है। चित्र में समकालीन टेंट, बंदूक, तोप, ध्वज, हंडा, लैम्प, कूप आदि का प्रयोग करते हुए परिदृश्य बनाने का प्रयास किया गया। इसमें कूप में एक ओर हिंदु व्यक्ति पूजा से पहले नहा रहा है तो दूसरी ओर एक मुस्लिम व्यक्ति ईदगाह में नमाज पढ़ने के लिए कूप से हाथ धो रहा है। ईदगाह पर कुछ लोग नमाज पढ़ रहे हैं तो मंदिर के पास बैठा साधु साधना कर रहा है। मंदिर और ईदगाह से आगे तोप दिखाई दे रही हैं, जिनके पास अंग्रेज अफसर खड़े हैं। यह चित्र 30 गुणा 36 इंच कैनवास पर प्रख्यात चित्रकार ओमप्रकाश बिरथरे द्वारा चित्रित किया गया जो कला भवन में रखा गया है। यह चित्र अद्वितीय है क्योंकि इस तरह के चित्र तैयार करने में अध्ययन, ऐतिहासिक तथ्य, परिवेश, कला कौशल एवं उच्च कोटि की कल्पना शीलता की आवश्यकता होती है।