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Lalitpur News: आजादी की जंग में तीन पीढि़यों ने दिया योगदान, चंद्रशेखर आजाद को भी घर में दिया था आश्रय

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संवाद न्यूज एजेंसी
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ललितपुर। आजादी की जंग में किलेदार परिवार का अहम योगदान रहा है। इस परिवार की तीन पीढि़यों ने अंग्रेजों से लोहा लिया था। तीसरी पीढ़ी के बृजनंदन किलेदार आजाद भारत में नगर पालिका अध्यक्ष भी बने और उन्होंने ही घंटाघर की नींव रखी थी।
शहर के मोहल्ला महावीरपुरा निवासी डॉ.रमेश किलेदार ने बताया कि उनके पिता के दादा पंडित जवाहर जू किलेदार ने महाराजा मर्दन सिंह के साथ देश की आजादी के लिए अंग्रेजों से लोहा लिया था और आजादी की जंग में अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला था। महाराजा मर्दन सिंह के साथ उन्हें भी अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया था और मर्दन सिंह के साथ लाहौर ले जाकर एक गढ़ी में बंद कर दिया था। इसके बाद उनको एक बार महाराजा मर्दन सिंह के साथ मथुरा की जेल लाया गया था, जहां उनकी मृत्यु हो गई। उन्होंने बताया कि महाराजा मर्दन सिंह से किलेदारी मिलने की वजह से ही उनको यह उपाधि मिली थी। जिस पर उनके परिवार के सभी सदस्य आज भी अपनी नाम के आगे किलेदार जोड़ते हैं। इसके बाद जवाहर जू किलेदार से प्रेरित होकर पौत्र पंडित नंद किशोर किलेदार भी आजादी की जंग में कूद पड़े। वह पूरी तरह गांधीजी के सिद्धांतों पर चलते थे, लेकिन इसके बाद भी वह आजादी की जंग में शामिल क्रांतिकारियों की पूरी मदद करते थे। तीसरी पीढ़ी के यानि नंदकिशोर किलेदार के पुत्र बृजनंदन किलेदार भी आजादी की जंग में कूद पड़े थे और वर्ष 1932 में उन्होंने शहर में तिरंगा झंडा लहराकर आजादी का बिगुल फूंका था। इस पर उन्हें जेल जाना पड़ा था। इसके बाद वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी उन्हें एक वर्ष तक नजरबंद किया गया था। वह बाल्यकाल से ही अपने दादा और पिता से प्रभावित थे और आजादी की जंग में हिस्सा लिया। आजादी की जंग के दौरान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद को भी किलेदार परिवार ने आश्रय दिया था। चंद्रशेखर आजाद कई बार घटनाओं को अंजाम देकर ललितपुर आए, तो नंदकिशोर किलेदार ने उनको अपने पैतृक गांव सिवनी खुर्द में अपने मकान में छिपाया और फिर कुछ दिनों बाद उनके मकान से लगे पीछे वाले मकान से उन्हें बैलगाड़ी में बैठाकर दैलवारा स्टेशन से आगे महाराज सड़ग सिंह देव के यहां खनियाधारा भिजवाया था।
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बेटी की शादी में पैराल का प्रस्ताव ठुकराया था
डॉ.रमेश किलेदार ने बताया कि वर्ष 1942 में उनकी बहन शकुंतला का विवाह होना था, तब उनके बाबा नंदकिशोर किलेदार व पिता बृजनंदन किलेदार दोनों ही जेल में थे। तब अंग्रेजी अधिकारी ने दोनों पिता-पुत्र को बेटी की शादी में शामिल होने के लिए पैरौल देने की बात रखी, लेकिन उन्होंने इसके लिए मना कर दिया था।
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घर के आंगन की मिट्टी लखनऊ व दिल्ली पहुंची
आजादी में किलेदार परिवार की तीन पीढि़यों ने अंग्रेजों के खिलाफ लोहा लिया था। इसी वजह से पांच अगस्त 1989 को उनके घर के आंगन की पवित्र मिट्टी को एक कलश में भरकर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और वहां से देश की राजधानी दिल्ली में महात्मा गांधी की समाधि स्थल पर ले जाया गया था। इसके लिए इस दिन एक समारोह का आयोजन किया गया था।
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