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दो करोड़ खर्च, नहीं बदली तस्वीर

Mon, 07 Sep 2015 08:00 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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 सुम्मेरा तालाब के घाटों पर स्थित मंदिरों की श्रृंखलाएं शताब्दियों से सांस्कृतिक व धार्मिक गतिविधियों का केंद्र रहे हैं। इन घाटों का उपयोग कभी व्यवसायिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण रहा है। बताया जाता है कि प्राचीन काल में ललितपुर नगर गुड़ की प्रमुख मंडी था। उस समय बैलगाड़ी ही सड़क परिवहन का एक मात्र माध्यम थीं। व्यवसायी बैलगाड़ियों से राजस्थान की सांभर झील तक गुड़ का निर्यात करते थे, वहां से नमक आयातित होकर ललितपुर आता था। व्यापारियों के अत्यधिक आवागमन के बावजूद उन्हें ठहरने के लिए यहां लॉज, सरांय अथवा धर्मशालाएं नहीं थीं, जिसके परिणामस्वरूप सुम्मेरा तालाब को रैन बसेरा के रूप में उपयोग किया जा जाने लगा था। तालाब पर बने घाटों पर पुरुष व महिलाओं को पृथक स्नान करने की सुविधा थी। सुम्मेरा तालाब के घाटों पर तैराकी का अभ्यास करके नागरिकों में खेल प्रतिभाओं को विकसित किया जाता था। इसके अलावा तालाब पर स्थित श्रृंखलाबद्ध मंदिर यहां धार्मिक एवं पारंपरिक रूप से प्राचीनकाल से ही जुड़े हुए हैं। कार्तिक मास में महिलाएं प्रात: काल यहां आकर स्नान-ध्यान करती हैं तथा घाटों पर कथा श्रवण के उपरांत अपने व्रत का उद्यापन करती हैं। नवरात्रि के अंतिम दिन यहां जवारे विसर्जित किए जाते हैं। जल बिहार (डोल ग्यारस) के दिन नगर के सभी देवालयों के देव नगर भम्रण करते हुए सुम्मेरा तालाब के विभिन्न घाटों पर स्नान के लिए आते हैं। गणेश चतुर्थी के दिन इसी तालाब में गणेश प्रतिमाएं विसर्जित होती हैं। करवा चौथ के दिन महिलाएं अपने सुहाग के दीघार्यु होने की कामना से तालाब में जलते हुए दीपक विसर्जित करती हैं। विवाह के दौरान वर व वधू के हाथों में बांधा जाने वाले मौर को मोराई छट पर इसी तालाब में विसर्जित किया जाता है। लोगों की आस्था है कि सुम्मेरा तालाब में मौर विसर्जन से नवदंपति हर प्रकार की बाधाओं से निजात पाते हैं। पितृ पक्ष में पूर्वजों को तर्पण करने के लिए नागरिक इसी तालाब में नहाकर पूजन अर्चन करते हैं। इन तमाम विशेषताओं से परिपूर्ण प्राचीन सुम्मेरा तालाब उपेक्षा के चलते अपना अस्तित्व खोता जा रहा है।
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