ललितपुर। फसल का उत्पादन बढ़ाने की आस में किसान लगातार रसायनिक खादों का प्रयोग कर रहा हैं, लेकिन अब माटी बीमार होने लगी है। मृदा परीक्षण प्रयोगशाला के आंकड़ों पर गौर करें तो सभी छह विकास खंडों में जीवांश कार्बन व फास्फेट, मध्यम और नाइट्रोजन न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई है, जबकि माटी उत्तम स्थित किसी ब्लॉक क्षेत्र में नहीं मिली। इसे लेकर कृषि वैज्ञानिक भी चिंतित हैं। उनका कहना है कि किसानों को डीएपी और यूरिया की जगह अब जैविक खाद का प्रयोग करना चाहिए अन्यथा भविष्य में माटी बंजर होने से इन्कार नहीं किया जा सकता।
यहां करीब 3,51,015 हेक्टेयर कृषि क्षेत्रफल है, जिसमें किसान रबी, खरीफ और जायद की फसलों में लगातार डीएपी व यूरिया का प्रयोग कर रहा है। इसका असर अब माटी पर दिखने लगा है। मृदा परीक्षण प्रयोगशाला में इस साल अलग-अलग ब्लॉक क्षेत्रों की मिट्टी का सैंपल लेकर परीक्षण किया गया तो आंकड़े चौंकाने वाले सामने आए हैं।
सबसे खराब स्थिति नाइट्रोजन की आई है। सभी ब्लॉकों में नाइट्रोजन न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई है जबकि फास्फेट और जीवांश कार्बन मध्यम स्तर पर पहुंच गई है। इसका असर गेहूं व अन्य फसलों के उत्पादन पर पड़ने लगा है।
किसान इन पोषक तत्वों की भरपाई के लिए जिस तरह से डीएपी और यूरिया का प्रयोग कर रहा है, उससे भविष्य में जमीन बंजर होने से कृषि वैज्ञानिक भी इंकार नहीं कर रहे हैं। उनका कहना है कि किसानों को जैविक खादों में गोबर, केंचुआ व मुर्गा की खाद डालकर पोषक तत्वों की कमी पूरी करना चाहिए, अन्यथा में फसलों की पैदावार भी प्रभावित हो सकती है।
उप कृषि निदेशक बसंत कुमार दुबे का कहना है कि किसान अपनी फसलों की पैदावार बढ़ाने व मिट्टी के पोषक तत्वों की पूर्ति के लिए जागरूक हो जाएं। खेत की मिट्टी का परीक्षण कराएं। परीक्षण के आधार पर तत्वों की कमी के लिए विशेषज्ञों से सलाह लेकर कार्य करें, इससे मिट्टी बीमार नहीं होगी। (संवाद)क