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तालाबपुरा में आयोजित हिंदी साहित्य भारती की संगोष्ठी को किया संबोधित कर रहे थे
अमर उजाला ब्यूरो
ललितपुर। अंतरराष्ट्रीय हिंदी साहित्य भारती के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष व पूर्व बेसिक शिक्षा मंत्री डॉ. रवींद्र शुक्ला ने कहा कि धर्म से निरपेक्ष होकर समाज गतिमान नहीं रह सकता। समाज को अपने पारंपरिक मूल्यों को लेकर आगे बढ़ना चाहिए। भारत की परंपरा में मानवता का स्वागत किया गया है किंतु दानवता का दलन करना भी हमारी परंपरा का ही हिस्सा है। वह रविवार को तालाबपुरा में हिंदी साहित्य भारती की संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि हिंदी और साहित्य मां भारती की सेवा के उपकरण हैं। मां भारती की सेवा वस्तुतः भारतमाता की सेवा है। हमारे देश में भारतीय ज्ञान परंपरा का समुचित अवदान रेखांकित नहीं किया गया है। भारत का नामकरण उसके निवासियों द्वारा इस ज्ञान परंपरा में संलग्न होने के कारण हुआ। हमारा देश ‘भारत इज़ भारत है, इंडिया दैट इज भारत नहीं’ संविधान से इंडिया शब्द गायब होगा और भारत ही रहेगा, इसकी तैयारी चल रही है।
उन्होंने धर्मनिरपेक्ष शब्द की व्याख्या करते हुए उसकी असंगति को रेखांकित करते हुए कहा कि धर्म से निरपेक्ष होकर नहीं हुआ जा सकता। हम या तो धर्म के पक्ष में होंगे या इसके उलट अधर्म के पक्ष में। हिंदी साहित्य भारती वर्तमान में 36 देशों में कार्य कर रही है। वहीं, देश और उत्तर प्रदेश के विभिन्न ज़िलों में यह संगठन कार्यरत है।
विशिष्ट अतिथि के रूप में पं बाबूलाल द्विवेदी, अखिलेश मालवीय, विनोद शर्मा ने संबोधित किया। इससे पहले सोनू बाथम ने ‘विश्व जगत में हिंदी का जयगान करें’ गीत के माध्यम से संस्था के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। सुदामा पाठक ने संगठन के पदाधिकारियों के संबंध में जानकारी दी। कार्यक्रम की अध्यक्षता हिंदी साहित्य भारती के ज़िलाध्यक्ष गगन चतुर्वेदी ने की। संचालन अच्युत अवस्थी एवं आभार राकेश नारायण द्विवेदी ने व्यक्त किया।
इस मौके पर प्रश्नोत्तरी कार्यक्रम में श्रोताओं के जवाब डॉ. शुक्ला ने दिए। कार्यक्रम में प्रदीप मोदी, मुक्ता सोनी, इं. हाकिम सिंह, करुणाकर शर्मा, राजेंद्र प्रकाश, सुबोध सारस्वत, मदन चतुर्वेदी, रामजीवन पटेल, डॉ. जगवीर सिंह, कवि पंकज अंगार, हरिनारायण चौबे, नीरज द्विवेदी, नैंसी चतुर्वेदी, पल्लवी, सोनम पुरोहित, पियूषा, लालताराम, डॉ विनय सोनी, डॉ विशाल जैन, डॉ मधुरेंद्र सहित कई प्रमुख लोग मौजूद रहे।
स्कूलों में वंदे मातरम का आदेश वापस लेने के बदले छोड़ दिया था पद
पूर्व बेसिक शिक्षा मंत्री डॉ. रवींद्र शुक्ला ने कहा कि अपने कार्यकाल में उन्होंने स्कूलों में वंदे मातरम गायन अनिवार्य करने का आदेश भारी दबाव पड़ने के बाद भी वापस न लेकर अपना पद छोड़ दिया था। उन्होंने कहा कि यदि उस समय ये आदेश वापस न लिया गया होता तो आज कुछ और स्थिति होती। उन्होंने कहा कि बहुत देर हो चुकी है, अब संभल जाओ, एक वर्ग विशेष की जनसंख्या का बड़ा अंतर आने वाले समय में परेशान कर सकता है।