तालबेहट। पशु चिकित्सा विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों की लचरता का आलम यह है कि वह मुख्य पशु चिकित्साधिकारी के आदेश को नहीं मानते। आदेश के तीन दिन बीत जाने के बाद ग्राम रजावन में पशुओं का टीकाकरण तक शुरू नहीं हुआ। इससे पशुपालकों में काफी आक्रोश है।
विकास खंड का ग्राम रजावन इस बार सांसद द्वारा गोद लिया गया है। इस गांव के पशु इस समय गलाघोंटू नामक बीमारी से जूझ रहे हैं। जिसके चलते कई पशु मर चुके हैं और कई बीमार हैं। पशुपालकों का आरोप है कि बीमार जानवरों के उपचार के लिए गांव के पशुपालक पशु चिकित्सालय गए लेकिन उनकी समस्या पर ध्यान नहीं दिया। इसके चलते पशुपालकों को प्राइवेट लोगों से जानवरों का उपचार कराना पड़ रहा है।
मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. एसपी सिंह ने बुधवार को रजावन में जानवरों को वैक्सीन लगवाने की बात कही थी। उनके आदेश के तीन दिन बाद भी गांव के जानवरों को कोई वैक्सीन नहीं लग सकी।
इस संबंध में जब उनसे शुक्रवार को बात कर वैक्सीन न लगाए जाने की जानकारी दी गई तो उन्होंने बताया कि वह इस मामले को दिखवाते है। उन्हें गांव में वैक्सीन लगवाने की जानकारी अधीनस्थों द्वारा दी गई है।
भदौना में पशुओं का टीकाकरण हो रहा है। रजावन में टीकाकरण न होने से जानवर मर रहे है। पशु चिकित्साधिकारी जानकारी के बाद नहीं आ रहे हैं।
- बंटी दुबे ग्राम प्रधान प्रतिनिधि रजावन
बीमारियों से बचाव के लिए पशुओं का कराएं टीकाकरण
ललितपुर। शुक्रवार को पशुओं को बारिश में होने वाली बीमारियों व उनसे बचाव के लिए एक दिवसीय प्रशिक्षण का आयोजन कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा महेशपुरा में किया गया। इसमें पशुओं को बीमारी से बचाने के लिए टीकाकरण की जानकारी दी गई।
पशुपालक वैज्ञानिक डॉ मारूफ अहमद ने पशुओं की विभिन्न बीमारियों व उसकी रोकथाम के लिए किसानों को जानकारी दी और पशुपालकों की अन्य समस्याओं का भी समाधान किया। उन्होंने पशुओं में जानलेवा रोगों से बचाव के लिए टीकाकरण कराने की सलाह दी।
उन्होंने बताया कि बरसात के मौसम में पशुओं को गलाघोंटू बीमारी हो जाती है। जिसमें पशुओं की मृत्यु भी हो जाती है। किसान बारिश से पहले गलाघोंटू का टीका लगवाकर अपने पशुओं को इस बीमारी से बचा सकते हैं। इसके अलावा पशुओं में किलनी और चिचड़ियों का भी काफी प्रकोप होता है। जिसके कारण पशुओं में बबेसियोसिस और थाइलेरियोसिस रोग हो जाता है। इसके नियंत्रण के लिए साइपरमेथ्ररिन या फ्लूमेथ्ररिन नामक दो मिली. दवा एक लीटर पानी में घोल बनाकर पशुओं के शरीर पर कपड़े इत्यादि से लगा देनी चाहिए। इससे चिचडियां मर जाती है और इस रोग से बचाव हो जाता है। इस दौरान डॉ. दिनेश तिवारी, डॉ. सरिता देवी, डॉ. एनके पांडेय, डॉ. नितिन यादव व दो दर्जन ग्रामीण मौजूद रहे।