जिन नन्हें हाथों में किताबें होनी चाहिए, वह हाथ बोझ उठा रहे हैं। उनके नाजुक कंधों पर परिवार के लिए रोटी की जुगाड़ करने का बोझ लदा हुआ हैं। हालत यह हैं कि आज भी सैकड़ों बच्चे सुबह स्कूल जाने के बजाय भूख मिटाने के लिए मशक्कत करते देखे जा सकते हैं। ऐसे कई बच्चे चाय की दुकान पर कप उठाते हुए, कंधे पर बोरी रखकर कूडें के ढेर पर, हाथ में कटौरा लेकर भीख मांगते हुए या फिर सर पर लकड़ी का गट्ठर रखे हुए आसानी से देखे जा सकते हैं। सहरिया आदिवासी समुदाय के बच्चे ककहरा सिखने की जगह जंगलों से लकड़ी के गट्ठर ढो रहे हैं। खेद की बात हैं कि न तो विभागीय अधिकारियों को बच्चों का श्रम दिखाई पड़ रहा हैं और न ही जनप्रतिनिधियों को।
सर्व शिक्षा अभियान के तहत चौदह वर्ष तक के सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा हैं। इस अधिनियम के अस्तित्व में आने से सभी बच्चों को जूनियर हाईस्कूल तक की शिक्षा ग्रहण करने का कानूनी हक मिल गया है। लेकिन आज भी कई बच्चे ऐसे हैं, जिनके कंधों पर परिवार के लिए रोटी की जुगाड़ करने का बोझ लदा हुआ हैं। ऐसे ही आदिवासी सहरिया समुदाय से ताल्लुक रखने वाली बालिकाएं सुबह होते ही पेट की खातिर कंधे पर बस्ते की जगह सर पर लकड़ी के गट्ठरों का बोझ ढोने को मजबूर हैं। हर रोज यह बालिकाएं कंपकंपाती ठंड में सर पर लकड़ी का बोझा लिए आसानी से देखी जा सकती हैं। इनके जैसे कई बच्चें पढ़ाई करने की इच्छा होने के बावजूद पेट की खातिर काम करने को मजबूर हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में न केवल यह बालिकाएं बल्कि ऐसे बच्चों की संख्या कहीं अधिक है जो पेट की भूख मिटाने और परिवार का भरण पोषण करने के लिए दो जून की रोटी की जुगाड़ करते आसानी से देखे जा सकते हैं। बच्चों का हाड़तोड़ श्रम न तो विभागीय अफसरों को नजर आ रहा है और न ही शिक्षकों को। कंपकंपाती ठंड में भी बच्चे परिवार की आय बढ़ाने के खातिर लकड़ी के गट्ठे उठाने में कोई गुरेज नहीं कर रहे हैं। विभागीय उदासीनता का खामियाजा मासूम बच्चों को भुगतना पड़ रहा है और उनका खिलता बचपन परिवार का बोझ उठाने में बरबाद हो रहा हैं। विभागीय अधिकारियों का ध्यान इस ओर अपेक्षित है।