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समय बदला तो होली की परंपराएं भी बदल गईं

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रामलीला मैदान में एकत्रित की गई होलिका जलाने के लिए लकड़ी। - फोटो : TALDEHATE
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समय बदला तो होली की परंपराएं भी बदल गईं
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तालबेहट। समय के बदलाव के साथ तीज त्योहारों के मनाने के तौर तरीके भी बदल गए। कई प्राचीन परंपराएं भी बदल गईं। न तो अब किले की फाग होती है और न ही पहले की भांति ग्रामीण क्षेत्रों में चार दिन पहले खेली जाने वाली गुड़ लूट, लट्ठ मार और पानी की होली होती है। अब अबीर, गुलाल तक ही होली सीमित होती जा रही है।
नगर में पहले 24 से अधिक स्थानों पर होलिका दहन किया जाता था। इसके लिए जंगलों से काटकर लकड़ी लाई जाती थी। इसमें सबसे बड़ी होली दहन होने वाली टोली को पुरस्कृत किया जाता था। लेकिन, जंगलों की अवैध कटान पर रोक और लकड़ी के अभाव के चलते होलिका दहन स्थलों पर लड़की का अभाव दिखने लगा। कई जगह होली दहन तक बंद हो गया। कुछ स्थानों पर लोगों द्वारा अतिक्रमण करने से होलिका दहन बंद हो गया। होलिका दहन के कुछ घंटे शेष रह गए हैं, इसके बावजूद कई स्थानों पर लकड़ी के नाम पर रस्म अदायगी नजर आ रही है। रामलीला मैदान में अवश्य कुछ लकड़ी एकत्रित दिखी है। अब न पहले की तरह चंदा एकत्रित करने वाले नजर आ रहे हैं और न ही होली पर सुनाए जाने वाले पुराने नारों की गूंज सुनने को मिल रही है।
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अधिकांश लोगों का मानना है कि अब लोगों के पास पैसा है, परंतु डिजिटल युग में आदमी के व्यस्त होने से होली का उत्साह कम हो गया है। अब लोग त्योहारों पर अपने घरों में सीमित होकर रह गए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में लकड़ी की मौजूदगी की बावजूद यह त्योहार आपसी मनमुटाव और गांव की राजनीति की भेंट चढ़ता जा रहा है।
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