फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

आदिवासी परिवारों के घरों में फीकी रहेगी दीवाली

विज्ञापन
कच्ची झोपड़ी में गुजारा करते आदिवासी लोग - फोटो : LALITPUR
विज्ञापन
पाली/ललितपुर। वर्तमान सरकार में सहरिया आदिवासियों का भला नहीं हो सका है। न तो उन्हें पक्का आशियाना मिल पाया है और न सस्ते राशन की व्यवस्था हो पाई है। उन्हें एक किलोमीटर दूरी से पानी जुटाना पड़ रहा है। यह कहानी ग्राम सिमरधा के मजरा पठला के सहरियों की है। इस गांव की दूरी तहसील पाली से दो किलोमीटर है। ऐसे में गांव के सहरियों की दीवाली फीकी रहने के आसार हैं।
विज्ञापन

सरकार द्वारा तमाम कल्याणकारी योजनाएं संचालित की जा रही हैं। इनमें प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्जवला योजना समेत अन्य योजनाएं काफी चर्चित रही हैं, लेकिन इसकी एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि जिले में सहरिया आदिवासियों को इनका लाभ नहीं मिल पाया है। तहसील पाली के ब्लाक बिरधा में सिमरधा ग्राम पंचायत के मजरा पठला में रहने वाले सहरियों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। कई आदिवासी अपने पूर्वजों के समय से जंगल में ही लकड़ी से बने मकानों में रहते चले आ रहे हैं।
सबसे ज्यादा परेशानी उस समय खड़ी हो जाती है, जब बीमार होने पर उन्हें आसपास इलाज की सुविधा नहीं मिलती है। कुछ परिवारों के राशनकार्ड बने हैं, जिन्हें राशन लेने के लिए सिमरधा गांव जाना पड़ता है। गांव के निवासी समाजसेवी दयाराम चौबे का कहना है कि यहां के आदिवासी शिक्षित नहीं हैं।
विज्ञापन

---
गांव में बने हैं कच्चे मकान
मजरा पठला में अधिकतर मकान घास- फूस के बने हैं। ऐसे मकानों को पक्का करने के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना शुरू की गई है, लेकिन यहां के अधिकांश व्यक्तियों के आवास स्वीकृत नहीं हो पाए हैं।
----
छह लोगों के परिवारों में सफेद राशन कार्ड बना है। पांच किलोग्राम गेहूं व चार किलो चावल में ही मिलता है, जिसे लेने के लिए सिमरधा गांव जाना पड़ता है।
- फूलबाई
----
गांव में पानी की बहुत समस्या है। आधे से एक किलोमीटर दूरी से पानी भरना पड़ता है और पानी भरने में ही दिन यूं ही गुजर जाता है। वही, सड़क की भी समस्या बनी हुई है। नाला पार करके जाना पड़ता है, जिसमें गिरने का डर भी बना रहता है।
- ममता सहरिया
----
जंगल से सूखी लकड़ियां बीन कर गट्ठा बनाते हैं, फिर उसे सिर पर रख कर तीन किलोमीटर दूर नगर पंचायत पाली में बेचने के लिए जाते हैं। सरकारी योजनाएं तो दूर, न आवास और न ही राशन कार्ड बना है।
- गुड्डी सहरिया
---
हमारे पास न तो राशन कार्ड है और न ही पेंशन मिलती है। पक्के आवास के अभाव में लकड़ियों से बने झोपड़े में जीवनयापन कर रहे हैं।
- हल्का सहरिया
----
बच्चों को पालने के लिए जंगल से लकड़ी बीनते हैं और फिर उसे बेच देते हैं। इस तरह घर का गुजारा चल रहा है। कई बार कहने के बाद भी प्रधानमंत्री आवास स्वीकृत नहीं हुआ।
- प्रेमबाई
----
जब तक मौके की वास्तविक स्थिति का पता नहीं चल जाता है, तब तक हम इस मामले में कुछ नहीं कह सकते हैं।
- अनिल कुमार मिश्र
मुख्य विकास अधिकारी
----
आवास सहित विभिन्न योजनाओं का लाभ नहीं मिलने का मामला संज्ञान में आया है। इस संबंध में बृहस्पतिवार को जिलाधिकारी और मुख्य विकास अधिकारी से वार्ता कर पठला गांव के सहरियों को योजनाओं से लाभान्वित कराया जाएगा।
विज्ञापन

- मनोहरलाल पंथ
श्रम एवं सेवायोजन राज्यमंत्री उत्तर प्रदेश शासन

कच्ची झोपड़ी में मिट्टी लगाती आदिवासी महिला- फोटो : LALITPUR

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें