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सूख गए गिनीज बुक में दर्ज पौधे

Fri, 17 Jun 2016 01:19 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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plant, lalitpur news - फोटो : amar ujala, jhansi news
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ललितपुर। गिनीज बुक में दर्ज जिले के पौधरोपण का वर्ल्ड रिकार्ड मिटता जा रहा है। स्थिति यह है कि विभाग ने सूखे को देखते हुए सिंचाई के संसाधनों की ओर ध्यान नहीं दिया। सिंचाई के अभाव में ग्राम दूधई, चीमना, मामदा वन क्षेत्र में अधिकांश पौधे सूख गए हैं और अब क्षेत्र में उनके केवल ठूंठ ही नजर आ रहे हैं। खास बात यह है कि वन विभाग के अफसरों ने इस पौधरोपण को भगवान भरोसे छोड़कर नए गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड की तैयारी शुरू कर दी है।
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जिले में 78 हजार हेक्टेयर वन क्षेत्र है, जो प्रदेश में सबसे अधिक है। इस कारण जिले में पौधरोपण पर विशेष ध्यान दिया जाता है। हरियाली को बढ़ावा देने के लिए एक के बाद एक पौधरोपण कराया जा रहा है। बीते महीनों में शासन ने गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड बनाने के लिए एक दिन में एक लाख पौधेरोपने का लक्ष्य तय किया था। हालांकि, जिस समय पौधरोपण कराया गया था, उस समय मानसून सीजन पूरी तरह समाप्त हो गया था।

लेकिन, इसकी अनदेखी कर वन अफसरों ने अपनी पीठ थपथपाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी और वन क्षेत्र में तय लक्ष्य से ज्यादा पौधों का रोपण करा दिया। जिले में 1.10 लाख पौधे रोपे  गए। शुरुआत से ही वन क्षेत्रों में पानी की समस्या थी। हालांकि, विभागीय अफसरों ने पौधों को बचाने के लिए बोरिंग कराई, लेकिन सिंचाई व सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम के अभाव में पौधे दम तोड़ने लगे।
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वर्तमान में चार में से दो बोर पूरी तरह पानी छोड़ चुके हैं। जो दो बोर काम कर रहे हैं, उनमें चंद पौधों की सिंचाई हो पा रही है। 
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि वन क्षेत्रों में इक्का-दुक्का पौधों में ही हरियाली दिखाई दे रही है। जहां नजर दौड़ाते हैं तो अधिकांश पौधों के ठूंठ दिखाई देते हैं।  

वर्ल्ड रिकार्ड से नहीं होगा भला
शासन एक दिन में लाखों पौधे रोप कर भले ही प्रदेश का नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज कराने में कामयाब हो रहा हो, लेकिन पौधों के बच नहीं पाने पर शासन की किरकिरी भी हो रही है। जानकारों का कहना है कि पौधे लगाने की होड़ नहीं लगाई जाए, बल्कि पौधों को बचाने का प्रयास किया जाए। तभी पौध रोपण का लक्ष्य हासिल होगा।

70 रुपए का एक पौधा
पौधरोपण कराने में शासन का करीब डेढ़ करोड़ रुपए खर्च हुआ था, इसमें एक पौधा करीब 70 रुपए का पड़ा था, साथ ही मजदूरों द्वारा गड्ढे खोदने, पौधों को लाने की मजूदरी, पौधरोपण की मजदूरी, इसके बाद पौधों क सिंचाई के लिए लगाए गए मजदूरों को पैसा दिया गया, लेकिन सब ठिकाने लग गया।


जुलाई माह में मानसून के दौरान मृत पौधों को बदलकर उनके स्थान पर जीवित पौधे रोपित कर दिए जाएंगे, इसके अलावा जल स्रोतों के रिचार्जिंग के प्रयास किए जा रहे हैं।
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- वीके जैन
प्रभागीय निदेशक
सामाजिक वानिकी प्रभाग।
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