महरौनी (ललितपुर)। गरीबों को राहत देने के उद्देश्य से संचालित शासकीय योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पा रहा है। वह अपने हक की मांग के लिए अधिकारियों की चौखट पर भटक रहे हैं , लेकिन उनहें निराशा ही हाथ लग रही है। दूसरी ओर गरीबों के हक पर कब्जा करने वाले साधन संपन्न अपात्र लोग मौज उड़ा रहे हैं।
गरीबों के लिए संचालित विभिन्न राशन वितरण, पेंशन, आवास योजनाओं के क्रियान्वयन में फर्जीवाड़ा चल रहा है। यह योजनाएं अपात्रों को लाभान्वित करने का जरिया बन गई हैं। जिम्मेदार लोग मनमानी से अपने चहेतों को लाभ दिलाने में लगे हैं। अनेक गरीब परिवार ऐसे हैं, जो भुखमरी के कगार पर हैं और मिट्टी के कच्चे घरौंदों में किसी तरह जीवन यापन कर रहे हैं, लेकिन उन तक सरकारी मदद नहीं पहुंच रही है। महरौनी नगर व क्षेत्र में अनेक ऐसे पात्र जरूरतमंद गरीब हैं, जिनको विभिन्न शासकीय योजनाओं से दरकिनार कर दिया गया है और उनकी जगह सक्षम लोगों को वरीयता दी जा रही है। मदद नहीं मिल पाने से गरीब परिवारों की दशा काफी खराब बनी हुई है और जीवन- यापन कर पाना कठिन हो रहा है, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो पा रही।
खराब है लखन के परिवार की स्थिति
महरौनी (ललितपुर)। कस्बा महरौनी के मलैयापुरा निवासी लखन विश्वकर्मा भूमिहीन गरीब व्यक्ति है, जो घड़ी सुधारने का काम करता है। मोबाइल फोन के बढ़ते चलन से अब लोगों की कलाई से घड़ी दूर होती जा रही है और घड़ी सुधारने का काम नहीं चल रहा है। ऐसे में लखन के सामने अपनी पत्नी भारती और दो छोटे बच्चों कुलदीप व प्रिंसी के भरण पोषण का संकट खड़ा हुआ है। गरीबी का दंश झेल रहे लखन का परिवार काफी परेशान है, क्योंकि इस परिवार को किसी भी शासकीय योजनान्तर्गत मदद नहीं मिल रही है।
परिवार को ना तो पेंशन का सहारा है और ना ही अंत्योदय या बीपीएल राशन कार्ड दिए गए हैं। ऐसे में इस परिवार के लिए दो जून की रोटी जुटा पाना मुश्किल है। लखन का परिवार जीर्णशीर्ण कच्चे मिट्टी के घरौंदे में खौफ के साए में दिन काट रहा है, क्योंकि इस घरौंदे का छप्पर कभी भी तेज हवा के साथ धराशायी हो सकता है।
तंगहाली में है मृतक का परिवार
महरौनी (ललितपुर)। कस्बा के कंचनपुरा में विधवा निराश्रित महिला आशा सेन अपने चार बच्चों के साथ परेशानी में दिन गुजार रही है। उसका नाम ना तो अंत्योदय सूची में है और ना ही कोई पेंशन योजना का लाभ मिल रहा है। आशा सेन के पति आलोक सेन विद्युत विभाग में संविदा कर्मी थे। 25 अप्रैल 2015 की दोपहर मशीन चेकिंग के दौरान आग से बुरी तरह झुलसने के बाद उसकी मौत हो गई थी। मृतक की पत्नी जिला प्रशासन से लेकर राज्यपाल तक अपने निराश्रित परिवार के भरण-पोषण के लिए मदद की गुहार लगा चुकी रही है, लेकिन कोई क्षतिपूर्ति मुआवजा या अन्य कोई मदद नहीं मिली है।
गरीब खा रहा दर- दर ठोकरें
महरौनी (ललितपुर)। कस्बा के मास्टर कालोनी निवासी महेंद्र सेन की आर्थिक स्थिति काफी खराब है। लेकिन, उसे शासकीय योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा। परिवार के भरण पोषण के लिए कोई आय का स्रोत भी नहीं है। उसके पिता हरनारायण की कुछ साल पहले मौत हो गई थी और परिवार में मां, एक विवाह योग्य बहन और पत्नी है। महेंद्र किसी नाई की दुकान पर काम करके बीस से पच्चीस रुपए कमा लेता है। लेकिन, इसी कमाई से घर चला पाना मुश्किल है। गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने हेतु राशन कार्ड को आवेदन किया था, लेकिन अंत्योदय सूची में शामिल करने के बजाए उसे पीला कार्ड बना दिया गया था। लेकिन, अब उसका पीला कार्ड भी निरस्त कर दिया गया है। महेंद्र ने बताया कि उसकी मां बीमार रहती है, जिसके इलाज में जो कुछ कमाता है वह खर्च हो जाता है।
चौकीदार का नाम अंत्योदय सूची से गायब
महरौनी (ललितपुर)। ग्राम धवारी निवासी साठ वर्षीय वृद्ध बच्ची सिंह काफी गरीब है। वह महरौनी की एक एजेंसी पर चौकीदारी कर के किसी तरह अपने परिवार का भरण पोषण कर रहा है। उसके परिवार में पत्नी और दो पुत्र हैं। दोनों पुत्र मजदूरी करते हैं। परिवार के पास सिर छुपाने के लिए मिट्टी की कच्ची खपरैल की झोपड़ी है, जिसमें किसी तरह गुजर बसर हो रही है। कोई कृषि भूमि भी नहीं है। अंत्योदय और बीपीएल राशन कार्ड नहीं है। वृद्धावस्था और समाजवादी पेंशन का लाभ नहीं मिल रहा है। कुछ समय पहले तक अंत्योदय सूची में नाम था, लेकिन इस वर्ष नाम सूची से गायब हो गया है, जिससे परिवार की दिक्कतें बढ गई हैं। बच्ची हि ने कई बार तहसील दिवस में प्रार्थना पत्र भी दिया, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई है।
भीख मांगने को विवश विधवा
महरौनी (ललितपुर)। तहसील अंतर्गत ग्राम छायन में 70 वर्षीय निराश्रित बूढ़ी महिला गरीबी के चलते गांव में ही घर-घर जाकर अपने भोजन का इंतजाम कर रही है, लेकिन उसका नाम अंत्योदय सूची से गायब है। फुंदन बाई नामक महिला के पति बदली खंगार की लगभग 24 साल पहले मौत हो गई थी। उसके तीन पुत्र हैं, जो मजदूरी करते हैं। यह परिवार भूमिहीन है। विधवा के नाम कुछ साल पहले सरकारी आवास बना था, जिसमें यह गरीब संयुक्त परिवार रहता है। महिला के नाम पहले राशनकार्ड था तो अनाज मिलने से गुजारा होता रहता था, लेकिन अब उसका नाम अंत्योदय सूची में नहीं है। वह गांव में भीख मांग कर दो वक्त की रोटी जुटाती है।