पांडव वन: अज्ञातवास का एक वर्ष पांडवों ने यहीं बिताया था
डोंगरा खुर्द (ललितपुर)। तहसील पाली में विंध्याचल पर्वत श्रृंखला के बीच स्थित पांडव वन पर्यटकों को आकर्षित करता है। यहां पहुंचने के लिए जंगल से होकर रास्ता जाता है, लेकिन कच्चे रास्ते की वजह से बरसात में बंद हो जाता है। जबकि, चारों ओर घना और हरा- भरा जंगल देखने का असली आनंद तो बरसात में ही आता है। मान्यता है कि पांडवों ने एक वर्ष का अज्ञातवास इसी क्षेत्र में बिताया था। अज्ञातवास बिताने के लिए यहां ऐसी परस्थितियां भी हैं। सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब आधुनिक युग में बरसात में यहां तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है तो उस दौर में स्थिति क्या रही होगी। पांडव वन पहुंचने के लिए ग्राम पारौल व मदनपुर से रास्ता है। लेकिन, दोनों रास्ते बरसात में बंद हो जाते हैं। मान्यता है कि दुर्वासा ऋषि 10 हजार शिष्यों सहित पांडवों के पास आए थे। पांडवों ने दुर्वासा ऋषि की पूजा अर्चना कर उन्हें प्रसन्न किया था। दुर्वासा ऋषि ने यहीं पर जामनी नदी में स्नान किया था। आज यह स्थान पांडव वन के नाम से जाना जाता है। पांडवों का स्थान बीचों बीच पत्थर की बड़ी चट्टानों और आम के पेड़ के पास है। माना जाता है कि यहां पर पिंडियों के स्वरूप में पांचों पांडव द्रोपदी समेत विराजमान हैं।
इन पिङिंयो के पास जलकुंड स्थित है, लेकिन इसका जलस्रोत साल में एक बार जेठ मास की अमावस्या पर ढाई दिन के लिए सूखता है। यह सिलसिला वर्षों से चला आ रहा है। पर्वत श्रृंखला पर स्थित प्राचीन सूरजमुखी हनुमानजी मंदिर है। करीब 90 वर्ष पूर्व यहां पर महायज्ञ हुआ था। मान्यतानुसार पांडवों ने यहां पर सैरा नृत्य खेला था। इसके चिह्न जामनी नदी में काफी गहराई में पत्थरों पर मिलते हैं। इन पत्थरों पर पशु, पक्षियों, जानवरों और इंसानों के पैरों के चिह्न अंकित हैं। पांडव वन की गुफाओं में भित्ती चित्र भी बने हुए हैं, जो सैकड़ों साल पुराने हैं। इनमें मुख्यत: हिरन के चित्र शामिल हैं।
घने जंगल के बीच कच्चा रास्ता
यह प्राचीन स्थल ग्राम डोंगरा खुर्द के पास स्थित ग्राम पारौल से पांच किलोमीटर और मदनपुर से 14 किलोमीटर दूर घने जंगल के बीच स्थित है। यहां जाने के लिए कच्चा मार्ग है, जो बरसात में बंद हो जाता है।
मकर संक्रांति पर लगता है मेला
इस प्राचीन स्थल पांडव वन में मकर संक्रांति पर सात दिन का मेला लगता है। मेला के आयोजन की सभी व्यवस्थाएं प्रशासनिक देखरेख में ग्राम पारोल की मेला समिति करती है। मेला के समय ग्राम प्रधान पारौल द्वारा कच्चे रास्ते पर मिट्टी डलवाकर सड़क सुधरवा दी जाती है, ताकि सैलानियों को पहुंचने में दिक्कत न हो।
न बिजली और न पानी
बरसात के दिनों में पांडव वन जाने के लिए दोनों रास्ते बंद हो जाते हैं। यहां का रास्ता कंकरीला-पथरीला व पगडंडी के रूप में बना हुआ है। बेहतर रास्ता नहीं होने की वजह से पर्यटकों को पंहुचने में काफी दिक्कत होती है। अन्य वाहन तो छोड़ो ट्रैक्टर से चलने में भी असुविधा होती है। लेकिन, बरसात के दिनों में विंध्याचल पर्वतों की श्रृंखला पर प्राकृतिक मनोहारी हरियाली छठा देखने में बहुत की सुंदर और मनोरम लगती है। यहां पर बिजली व पानी का इंतजाम नहीं है। प्रशासन द्वारा पेयजल के नाम पर एक हैंडपंप जरूर लगवाया गया, लेकिन उसमें भी गर्मियों में पानी नहीं निकलता है। यहां आने वाले पर्यटकों को कुंड के जल के अलावा और दूसरा इंतजाम नहीं है।
पांडव वन पर्यटन स्थल वन विभाग के क्षेत्र में आता है। इस वजह से सड़क नहीं बन पा रही है। मुख्यमंत्री को इस संबंध में पत्र लिखा जाएगा, ताकि क्षेत्र का विकास हो सके।
- नरेंद्र सिंह, उप जिलाधिकारी पाली
जमीन के बदले जमीन ट्रांसफर करके और भारत सरकार से अनुमति लेकर सड़क का निर्माण कराया जा सकता है। अथवा कार्यदायी संस्था वन विभाग की देखरेख में निर्माण करे तो काम बन सकता है।
- आरके शाही, वन क्षेत्राधिकारी, रेंज गौना