ललितपुर। जनपद प्राचीन व पौराणिक महत्व की संपदाओं से भरा पड़ा है। नाराहट क्षेत्र में ग्राम पारौल के पास विंध्याचल पर्वत श्रंखला के बीच स्थित तपो भूमि पांडव वन का महाभारत काल से गहरा नाता है। मान्यता है कि महाभारत काल में अज्ञातवास के दौरान पांचों पांडव अपनी पत्नी और मां के साथ पांडव वन में कुछ समय के लिए ठहरे थे। जहां दस हजार ऋषियों के साथ दुर्वासा ऋषि भी यहां पांडवों से मिले थे।
मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर दूर नाराहट क्षेत्र में ग्राम पटना पारौल के रास्ते से सात किलोमीटर जंगलों के रास्ते में ऊंची पहाड़ी पर पंडवन की प्राकृतिक छटा लोगों को बेेहद आकर्षित करती है। ऊंची पहाड़ी के नीचे से करीब तीन सौ फीट गहराई में मध्य प्रदेश से होकर आयी जामनी नदी एवं आसपास मौजूद दूसरी पहाड़ियों का मनोहारी दृश्य भी लोगों का मन मोह लेता है। महाभारत काल के दौरान पांडवों ने एक वर्ष के अज्ञात वास के दौरान यहां कुछ समय प्रवास किया था, इसीलिए इसका का नाम पांडव वन पड़ा। उनके अज्ञात वास के दौरान ही यहां दुर्वासा श्रृषि अपने दस हजार शिष्यों के साथ पांडवों के पास आये थे, जहां पांडवों ने दुर्वासा श्रृषि को पूजा आसन देकर प्रसन्न किया और स्नान ध्यान करने को कहा। तब पांडवों की प्रेमपूर्ण सेवा से प्रसन्न होकर दुर्वासा मुनि जामनी नदी में स्नान करने चल दिए। यह स्थान आज तपो भूमि पांडव वन के नाम से जानी जाती है। जामनी नदी गहराई लगभग तीन सौ फीट है और यहां पहाड़ी से उतरने के दौरान एक ओर मध्य में पत्थर की बड़ी चट्टानों, आम के पेड़ के पास है। जहां पांचों पांडवों की द्रोपदी सहित प्रतीक के रुप में पिंडीनुमा मूर्तियां भी स्थित है। इन पिंडियों के पास जल कुंड स्थित है, यहां पर जल श्रोत जेठ की अमावस्या पर ढाई दिन छोड़कर साल भर कभी नहीं सूखता। पर्वत की शृंखला पर स्थित प्राचीन सूरजमुखी हनुमानजी मंदिर है, जिसकी काफी मान्यता है। इस प्रतिमा में दर्शाया गया है कि हनुमानजी अहिरावण को अपने चरणों रखे हुए हैं।
नदी में चट्टानों पर अंकित हैं पद चिह्न, कुंडो है विशेष महत्व
मान्यतानुसार पांडवों ने यहां नृत्य शैरा खेला था। उसके पद चिह्न पर्वत श्रृंखला से काफी गहराई में जामनी नदी में पत्थरों पर दर्शित प्रतीत होते हैं। बताया जाता है कि पहले यहां पत्थर मोम जैसा होता था, जिससे पशु-पक्षियों व जानवरों और इंसानों के पैरों के चिन्ह पत्थरों पर अंकित हैं, जो आज भी दर्शित होते है। इसके प्रमाण पत्थरों में भित्ति चित्र हैं। बताया जाता है कि यहां करीब 90 वर्ष पहले एक महायज्ञ हुआ था, जिसमें हजारों की संख्या में श्रृद्धालुओं ने भाग लिया था। भंडारा के समय में यहां पर घी कम पड़ गया था, जिस पर एक महात्मा ने बताया कि पांडव पिंडियों के पास बने कुंड से जल भर लाओ और जब उस जल को कढ़ाई में डाला गया तो वह जल घी बन गया था। इसके बाद घी मंगवाकर उसी कुंड में डलवा दिया गया था।
कच्चे कंकरीले रास्ते से पहुंचते हैं पंडवन
यह प्राचीन स्थल व प्राकृतिक छटा बिखरेता प्राचीन स्थल ग्राम ङोगरा खुर्द के पास स्थित पारौल से पांच किलोमीटर किलोमीटर दूर घने जंगली कच्चे व खराब मार्ग पर स्थित है। सैकड़ों वर्षों से इस प्राचीन स्थल पांडव वन में मकर संक्रांति पर सात दिवसीय भव्य विशाल भंडारे का आयोजन होता चला आ रहा है, जबकि वर्तमान में इस मेले के आयोजन की सारी व्यवस्थाएं प्रशासनिक देख रेख में ग्राम पारोल की मेला समिति द्वारा कराया जाता है।
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पंडवन वन विकास के लिए लगातार प्रयास किया जा रहा है। ाजन प्रतिनिधि एवं अधिकारियों को भी कई बार अवगत कराया गया है। मेला के समय हर साल कच्चा रास्ता ठीक करा दिया जाता है।
चंदन सिंह, प्रधान प्रतिनिधि, पारौल।
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पर्यटक जंगल से होकर पैदल गुजरते हैं, तो पत्थर की चट्टानों के ऊबड़-खाबड़ रास्ते के कारण थकान महसूस होती है। लेकिन यहां प्राकृतिक हरा भरा जंगल एवं मनमोहक नदी गुफाओं को देखकर सारी थकान दूर हो जाती है।
भूपेंद्र सिंह, डोंगराखुर्द।
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करीब बीय वर्ष पहले तक किसान पांडव वन स्थित कुंड का जल लाकर खेतों के चारों ओर मेड़ पर उसका जल डाल देते थे। इससे फसलों में जो रोग रहता था, वह स्वत: दूर हो जाता था।
नन्हें परिहार, महाराजपुरा।
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पांचों पांडव द्रोपदी सहित यहां पारौल के जंगल में अज्ञातवास का समय बिताया था और नृत्य शैरा खेला था। जिनके पद चिह्न आज भी नदी में पत्थर की सिला पर अंकित हैं और कई विशाल गुफाएं भी आज मौजूद हैं।
जाहर सिंह लोधी, महाराजपुरा।
पांडव वन में स्थित प्राचीन सूरजमुखी हनुमानजी का मंदिर- फोटो : LALITPUR