संवाद न्यूज एजेंसी
डोंगराखुर्द (ललितपुर)। कस्बा नाराहट स्थित हनुमान मंदिर परिसर में चल रही श्रीराम कथा में कथा व्यास जगत गुरु शंकराचार्य ओंकारानंद महाराज और गौरव दास महराज ने राम वनवास की कथा का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि पुत्र के लिए माता पिता की आज्ञा पालन करना सबसे बड़ा धर्म है।
कथा व्यास ने कहा कि राजा दशरथ के मन में एक ही बात थी कि मैं अपने जीते जी राम को अयोध्या का राजा बनाकर राज तिलक कर दूं। राजा दशरथ ने युवराज राम को अपना उत्तराधिकारी घोषित करने का एलान कर दिया। पूरी अयोध्या नगरी श्रीराम के राज तिलक को लेकर उतावली हो उठी थी। भगवान श्रीराम के राज तिलक की बात देवताओं ने सुनी तो देवताओं के मन में विचार आया कि भगवान राजा बन जाएंगे तो राक्षसों का विनाश कैसे होगा। सभी देवता सरस्वती माता के पास जाते हैं और कहते हैं कि अगर भगवान राम वन नहीं जाएंगे तो राक्षसों का विनाश कैसे करेंगे। देवताओं की बात सुनकर सरस्वती माता दासी मंथरा के जिह्वा पर प्रवेश करती हैं और दासी मंथरा ने रानी कैकई के पास जाकर बोला कि राजा दशरथ श्रीराम का राज्याभिषेक करने जा रहे तो यह सुनकर माता कैकई ने कहा कि यह तो बहुत अच्छी बात है। राम हमारा बड़ा पुत्र है, लेकिन मंथरा ने बार बार समझाया कि अगर राम को राज्य मिला तो भरत का क्या होगा। यह बात सुनकर कैकयी कोपभवन में चली जाती हैं। यह बात सुनकर राजा दशरथ कोप भवन में पहुंचते हैं और कैकयी को मनाते हुए रुठने की वजह पूछते हैं। कैकयी ने राजा दशरथ द्वारा दिए हुए दो वरदान याद दिलाते हुए कहा कि श्रीराम को वनवास भेजने व दूसरा भरत का राज तिलक करने की बात कही। राजा महल से निकल दरबार में आए तो उन्होंने राज तिलक के स्थान पर प्रभु श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास दे दिया। राम बिना कुछ सवाल किए अपने पिता की बात सुनकर वनवास के लिए जाने लगे। अपने युवराज को वनवास जाता देख पूरी अयोध्या उनके साथ वन में जाने को तैयार थी। भीगी पलकों से श्रीराम को विदा किया।
भगवान श्रीराम, अनुज लक्ष्मण एवं माता जानकी के साथ वन जाने के कारण अयोध्या में सन्नाटा छा गया। माता कैकेयी के वरदान के बाद जब भगवान राम वन को गए तो उनके साथ माता सीता एवं अनुज लक्ष्मण भी साथ चल दिए। सुमंत रथ में उन्हें वन तक छोड़ने गए। सुमंत के वन में छोड़ने के बाद भगवान राम वन-वन भटकते हुए नदी पार करने के लिए केवट के पास पहुंचे। साक्षात भगवान को देखकर वह धन्य हो गया। नदी पार कराने के लिए अपनी नाव लेकर नदी किनारे आ गया। भगवान राम, लक्ष्मण एवं सीता को अपनी नाव में बैठाने से पूर्व केवट ने उनके पैर धोए। इसके बाद वह भारद्वाज ऋषि के आश्रम में पहुंचे। यहां से वे चित्रकूट की ओर गए। प्रभु श्रीराम को कांटों भरे रास्ते से गुजरते देख दर्शक भी द्रवित हो उठे। इस अवसर कृष्ण सखा उद्वव महाराज, आचार्य महेंद्र त्रिपाठी, सुरेन्द्र पाल बघेल, बॉबी राजा पटसेमरा, रामगोपाल नामदेव, संतोष सोनी अशोक नगर, हरेंद्र शाह राजू राजा प्रधान, नन्ने राजा आदि शामिल रहे।