प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से पहले 1842 में अंग्रेजों के खिलाफ आजादी का बिगुल फूंकने वाले मधुकर शाह को अंग्रेजों ने सागर की जेल में फांसी की सजा दी थी। मृतक राजेंद्र सिंह मधुकर शाह की तीसरी पीढ़ी के थे। वह रिश्ते में उनके नाती लगते थे।
आजादी में अपना बलिदान देने के कारण राव साहब के परिवार को नाराहट क्षेत्र में काफी सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। नाराहट वासियों ने राजेंद्र सिंह को पांच बार, उनकी पत्नी को एक बार और एक बार उनके पुत्र को प्रधान चुना।
राव साहब के परिवार ने रखी थी अमझरा घाटी मंदिर निर्माण की नींव
यूपी-एमपी बार्डर के पास नेशनल हाईवे पर नाराहट ग्राम पंचायत के अंतर्गत अमझरा घाटी पर हनुमान जी के मंदिर की गिनती क्षेत्र के प्रसिद्ध मंदिरों में की जाती है। इस मंदिर के निर्माण की नींव राव साहब के परिवार ने ही रखी थी। यहां मंगलवार और शनिवार को श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। इसके अलावा वसंत पंचमी पर दस दिनों तक चलने वाले मेले का आयोजन किया जाता है।